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कलीम अहमदाबादी

- 1966

कलीम अहमदाबादी

ग़ज़ल 8

अशआर 18

छेड़ती है मुझे आ आ के मिरी आज़ादी

गो मैं क़ैदी हूँ मिरे पाँव में ज़ंजीर भी है

कुछ नहीं है तिरे हाथों में लकीरों के सिवा

बात नासेह की है लेकिन ख़त-ए-तक़्दीर भी है

अपना जीना एक धोका अपना मरना इक फ़रेब

ज़िंदगी से ज़िंदगी की तर्जुमानी हो तो क्या

किस तरह इश्क़-ए-मजाज़ी को हक़ीक़ी कर लूँ

सामने तू है बग़ल में तिरी तस्वीर भी है

सर्द हो सकता नहीं सरगर्म इंसाँ का लहू

हादिसात-ए-नौ-ब-नौ में ज़िंदगानी हो तो क्या

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