ख़ावर रिज़वी के शेर
मैं क्यूँ कहूँ कि ज़माना नहीं है रास मुझे
मैं देखता हूँ ज़माने को रास मैं भी नहीं
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere