मिन्हाज ख़ान के शेर
उन की तहज़ीब हो गई रुख़्सत
तुझ से फेरें हैं जो नज़र उर्दू
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दिल तड़प जाता है जिस दम याद आ जाते हैं आप
आप से बिछड़े हमें कितने ज़माने हो गए
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बेवक़ूफ़ अपने को कहते हुए बाहर निकले
जब वहाँ सब थे समझदार तो हम क्या करते
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पहले तो ख़ुद को दफ़्न किया अपनी क़ब्र में
फिर अपना मर्सिया भी सुनाना पड़ा मुझे
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मेरी उम्मीदों के जितने थे शजर सूख गए
जब किसी और से जा कर वो मिला शाम के बा'द
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