मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी का परिचय
पहचान: शास्त्रीय कवि, साहित्यकार, सुलेखकार, अलंकार शास्त्र के विशेषज्ञ और प्रतिष्ठित शिक्षक
मुंशी देवी प्रसाद ‘सहर’ बदायूँनी उर्दू भाषा के उन प्रतिभाशाली लेखकों में गिने जाते हैं जिन्होंने कविता, गद्य, सुलेख और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान कीं।
सहर बदायूँनी का जन्म 24 दिसंबर 1840 को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिता मुंशी चुन्नीलाल अख़गर स्वयं भी साहित्यिक रुचि रखते थे, इसलिए सहर को प्रारंभ से ही साहित्यिक वातावरण प्राप्त हुआ। उनके पूर्वजों का संबंध बांगरमऊ (कस्बा संडीला) से था।
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की और अपनी योग्यता के बल पर डिप्टी इंस्पेक्टर (मदारिस) के पद तक पहुँचे। उनका जीवन का बड़ा हिस्सा दिल्ली और लखनऊ जैसे प्रमुख साहित्यिक केंद्रों में गुज़रा, जहाँ उनकी विद्वता और साहित्यिक रुचि को और निखार मिला।
सहर बदायूँनी को कम उम्र से ही शायरी का शौक था और वे अपने पिता से मार्गदर्शन लेते रहे। वे सुलेख (कैलिग्राफी) में अद्वितीय थे और शीघ्र कविता कहने की क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध थे। सेवा निवृत्ति के बाद भी उन्होंने शिक्षण कार्य जारी रखा। वे विद्यार्थियों को न केवल साहित्य पढ़ाते बल्कि सुलेख भी सिखाते थे।
उन्होंने लेखन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में मुहीत-उल-मसाहत, मिरआत-उल-उलूम, ख़ुलास-ए-मंतिक, दस्तूर-उल-अमल माल, मियार-उल-इमला, रिसाला क़ियाफ़ा, मियार-उल-बालाग़त और अरज़ंग-ए-चीन शामिल हैं। विशेष रूप से मियार-उल-बालाग़त अलंकार शास्त्र की एक महत्वपूर्ण और प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है, जबकि अरज़ंग-ए-चीन सुलेख के सिद्धांतों पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति है। इसके अतिरिक्त उनके दो दीवान भी उपलब्ध हैं, जिनमें सहर सामरी उल्लेखनीय है।
सहर बदायूँनी ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के माध्यम से उर्दू साहित्य, शिक्षा और कैलीग्राफी (सुलेख) को महत्वपूर्ण बढ़ावा दिया। उनकी अधिकांश पुस्तकें मुंशी नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित हुईं।
मृत्यु: 1902 में उनका निधन हुआ।