रउफ़ ख़लिश के शेर
बिखरते ख़्वाबों से ता'बीर के धुँदलकों तक
मुहाजरत ने कचोके बहुत लगाए हैं
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जिस तनाज़ुर में भी देखो ख़ुश-जमालों को 'ख़लिश'
ज़ाविया बिगड़ा नज़र का सारे बिगड़े ज़ाविए
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वैसे तो देखने में जाज़िब-नज़र हैं नक़्शे
कुछ तो 'ख़लिश' कमी है ऊँची 'इमारतों में
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ज़ख़्मों को फूल कर दे तन्हाइयों को मरहम
सौ क़ुर्बतों पे भारी हिजरत का एक मौसम
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उतरो ख़ुद अपनी ज़ात की गहराई में 'ख़लिश'
उभरे जो अपने-आप को पाने की आरज़ू
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ग़म की धूप उतरते ही क्यूँ पिघलने लगती है
याद के घरौंदे में मोम की बनी खिड़की
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जज़्ब कर के रख लेना दस्तकें हथेली में
जब से मैं सफ़र में हूँ हम-सफ़र हैं दरवाज़े
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उतरो ख़ुद अपनी ज़ात की गहराई में 'ख़लिश'
उभरे जो अपने-आप को पाने की आरज़ू
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गुज़रते वक़्त के आसार कौन छोड़ गया
ज़माने टल गए लेकिन अटल रहे हैं सुतून
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कहीं हुजूम में तन्हाई मिल गई थी मुझे
मैं रो दिया तिरी यादों से गुफ़्तुगू कर के
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तेरी गुफ़्तार ख़लिश और क़रीना माँगे
बोल मीठे सही लहजे में ज़रा तल्ख़ी है
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इक जंग थी वो गर्मी-ए-गुफ़्तार नहीं थी
दोनों की अना मिटने को तय्यार नहीं थी
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