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रउफ़ रज़ा

1956 - 2016 | दिल्ली, भारत

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

रउफ़ रज़ा

ग़ज़ल 19

अशआर 56

वो ये कहते हैं सदा हो तो तुम्हारे जैसी

इस का मतलब तो यही है कि पुकारे जाओ

वो जो इक शख़्स तुम्हें याद किया करता था

आज मसरूफ़ बहुत है उसे तुम याद करो

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यूँही हँसते हुए छोड़ेंगे ग़ज़ल की महफ़िल

एक आँसू से ज़ियादा कोई रोने का नहीं

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सारी ख़ुशी हमारी आँखों से छन रही है

कुछ देर तुम ने गेसू लहरा दिए तो क्या है

जो भी कुछ अच्छा बुरा होना है जल्दी हो जाए

शहर जागे या मिरी नींद ही गहरी हो जाए

पुस्तकें 1

 

चित्र शायरी 2

 

वीडियो 17

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ऑडियो 12

उस का ख़याल आते ही मंज़र बदल गया

कोई ज़ख़्म खुला तो सहने लगे कोई टीस उठी लहराने लगे

जितना पाता हूँ गँवा देता हूँ

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