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सफ़दर मिर्ज़ापुरी

1870 - 1930 | मिर्ज़ापुर, भारत

ग़ज़ल 1

 

शेर 5

घर तो क्या घर का निशाँ भी नहीं बाक़ी 'सफ़दर'

अब वतन में कभी जाएँगे तो मेहमाँ होंगे

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क़िस्मतों से मिला है दर्द हमें

कहीं आराम-ए-दिल हो जाए

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इक निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ सही

दिल की आख़िर कोई क़ीमत होगी

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पुस्तकें 10

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