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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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Salman Akhtar's Photo'

प्रसिद्ध शायर, लेखक और मनोचिकित्सक; फ़िलाडेल्फ़िया के जेफ़रसन मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा और मानव व्यवहार के प्रोफ़ेसर

प्रसिद्ध शायर, लेखक और मनोचिकित्सक; फ़िलाडेल्फ़िया के जेफ़रसन मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा और मानव व्यवहार के प्रोफ़ेसर

सलमान अख़्तर के शेर

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इक वही शख़्स मुझ को याद रहा

जिस को समझा था भूल जाऊँगा

कैसे हो क्या है हाल मत पूछो

मुझ से मुश्किल सवाल मत पूछो

झूटी उम्मीद की उँगली को पकड़ना छोड़ो

दर्द से बात करो दर्द से लड़ना छोड़ो

कोई शय एक सी नहीं रहती

उम्र ढलती है ग़म बदलते हैं

जब ये माना कि दिल में डर है बहुत

तब कहीं जा के दिल से डर निकला

चाँद सूरज की तरह तुम भी हो क़ुदरत का खेल

जैसे हो वैसे रहो बनना बिगड़ना छोड़ो

हम जो पहले कहीं मिले होते

और ही अपने सिलसिले होते

ज़िंदगी हम से तो इस दर्जा तग़ाफ़ुल बरत

हम भी शामिल थे तिरे चाहने वालों में कभी

वो भी हमारे नाम से बेगाने हो गए

हम को भी सच है उन से मोहब्बत नहीं रही

देखे जो मेरी नेकी को शक की निगाह से

वो आदमी भी तो मिरे अंदर है क्या करूँ

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत हो मगर

पहले सा जोश पहले सी शिद्दत नहीं रही

ये तमन्ना है कि अब और तमन्ना करें

शेर कहते रहें चुप चाप तक़ाज़ा करें

कुछ तो मैं भी डरा डरा सा था

और कुछ रास्ता नया सा था

कुछ तो अपने लिए भी रखना है

ज़ख़्म औरों को क्यूँ दिखाएँ सब

वो एक ख़्वाब जो फिर लौट कर नहीं आया

वो इक ख़याल जिसे मैं भुला नहीं सकता

निकले थे दोनों भेस बदल के तो क्या अजब

मैं ढूँडता ख़ुदा को फिरा और ख़ुदा मुझे

ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है

मैं इक इंसान हूँ और मुझ में ख़ुदा रहता है

जो बात छुपाई है सब से वो उन से छुपानी मुश्किल है

बाहर की कहानी आसाँ है अन्दर की कहानी मुश्किल है

गुफ़्तुगू तीर सी लगी दिल में

अब है शायद इलाज सन्नाटा

ज़िंदगी इस क़दर कठिन क्यूँ है

आदमी की भला ख़ता क्या है

जिस से सारे चराग़ जलते थे

वो चराग़ आज कुछ बुझा सा था

अपनी आदत कि सब से सब कह दें

शहर का है मिज़ाज सन्नाटा

झाँकते रात के गरेबाँ से

हम ने सौ आफ़्ताब देखे हैं

क्या नहीं जानता मुझे कोई

क्या नहीं शहर में वो घर बाक़ी

जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे

किस शख़्स की लगी है भला बद-दुआ मुझे

ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा

क्या बात है उदास से कुछ लग रहे हो तुम

हज़ार चाहें मगर छूट ही नहीं सकती

बड़ी अजीब है ये मय-कशी की आदत भी

बुत समझते थे जिस को सारे लोग

वो मिरे वास्ते ख़ुदा सा था

मुझे ख़बर थी इस घर में कितने कमरे हैं

मैं कैसे ले के वहाँ सारी दास्ताँ जाता

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