वासिफ़ अली वासिफ़
ग़ज़ल 39
अशआर 10
मिल चुके ख़ाक में मगर तेरा
दिल अभी इंतिज़ार करता है
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तुम्हारी बे-रुख़ी को ख़ाक परवा
तिरी महफ़िल में कोई ख़ाक आए
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हमारे पास ही वो आ रहे थे
ब-जा है हम वहाँ बे-जा गए हैं
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गुलशन में अपना कौन था साथी न आशियाँ
रख ली क़फ़स ने आबरू फ़स्ल-ए-बहार में
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तुझे इक बार क्या 'वासिफ़' ने देखा
तुझे फिर देखने की आरज़ू है
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