आसान और पसंदीदा नज़्में

सरल और मनपसंद शायरी का संग्रह

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हमेशा देर कर देता हूँ

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

मुनीर नियाज़ी

बोल

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आवारा

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

दस्तूर

दीप जिस का महल्लात ही में जले

हबीब जालिब

ख़ूबसूरत मोड़

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

साहिर लुधियानवी

औरत

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

कैफ़ी आज़मी

कभी कभी

कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है

साहिर लुधियानवी

अलाव

रात-भर सर्द हवा चलती रही

गुलज़ार

आदमी बुलबुला है

आदमी बुलबुला है पानी का

गुलज़ार

ताज-महल

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही

साहिर लुधियानवी

आख़िरी दिन की तलाश

ख़ुदा ने क़ुरआन में कहा है

मोहम्मद अल्वी

याद

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अकेले

किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो

गुलज़ार

किताबें

किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से

गुलज़ार

तराना-ए-हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

अल्लामा इक़बाल

तन्हाई

फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये खेल क्या है

मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है

जावेद अख़्तर

दस्तक

सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा

गुलज़ार

वक़्त

ये वक़्त क्या है

जावेद अख़्तर

कोई ये कैसे बताए

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है

कैफ़ी आज़मी

विसाल की ख़्वाहिश

कह भी दे अब वो सब बातें

मुनीर नियाज़ी

नौ-जवान ख़ातून से

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था

असरार-उल-हक़ मजाज़

अंदेशा

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

कफ़ील आज़र अमरोहवी

दुश्वारी

मैं भूल जाऊँ तुम्हें

जावेद अख़्तर

ग़ालिब

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ

गुलज़ार

मता-ए-ग़ैर

मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली

साहिर लुधियानवी

हिरास

तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर

साहिर लुधियानवी

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हबीब जालिब

दुआ

आइए हाथ उठाएँ हम भी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया

अल्लामा इक़बाल

मुलाक़ात

ये रात उस दर्द का शजर है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ए'तिराफ़

अब मिरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो

असरार-उल-हक़ मजाज़

गिरहें

मुझ को भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे

गुलज़ार

मकान

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है

कैफ़ी आज़मी

पास रहो

तुम मिरे पास रहो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इस बस्ती के इक कूचे में

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

इब्न-ए-इंशा

मजबूरियाँ

मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता

असरार-उल-हक़ मजाज़

फ़नकार

मैं ने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे

साहिर लुधियानवी

ये बातें झूटी बातें हैं

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं

इब्न-ए-इंशा

किस से मोहब्बत है

बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-अलीगढ़

सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक और रात

रात चुप-चाप दबे पाँव चले जाती है

गुलज़ार