अब्दुल माजिद दरियाबादी के लेख
उर्दू का वाइज़ शाइर
आज से कोई 25 साल पहले की बात है। 'अल-हिलाल' कलकत्ता के क्षितिज से नया-नया निकला था और देश का सारा माहौल अबुल कलाम के साहित्य और लेखन की गूँज से गूँज रहा था, कि एक दिन उसके किसी लेख के अंत में यह शेर नज़र से गुज़रा: ताज़ीर-ए-जुर्म-ए-इश्क़ है बे-सरफ़ा
ग़ालिब का फ़लसफ़ा
(लखनऊ रेडियो स्टेशन से प्रसारण, 16 फ़रवरी 42 ई. को ग़ालिब की बरसी के मौक़े पर) फ़लसफ़े (दर्शन) के नाम से घबराइए नहीं। फ़लसफ़ा मोटे-मोटे अनजाने शब्दों और भारी-भरकम, मुश्किल पारिभाषिक शब्दों का नाम नहीं है। फ़लसफ़ा नाम है ख़ुद को पहचानने का। यह ख़ुदा
ग़ालिब का एक फरंगी शागिर्द आज़ाद फ्रांसीसी
ग़ालिब का एक फिरंगी शागिर्द आज़ाद फ्रांसीसी पिछले अंक की टिप्पणियों (मआरिफ) में उर्दू के कुछ फिरंगी शायरों का जो संक्षिप्त ज़िक्र आया था, पाठकों ने उसमें दिलचस्पी ज़ाहिर की और दोस्तों को यह दास्तान सुखद और मज़ेदार लगी। इन लोगों की साहित्यिक रुचि