अब्दुल मतीन नियाज़
ग़ज़ल 25
नज़्म 10
अशआर 10
दिल ने हर दौर में दुनिया से बग़ावत की है
दिल से तुम रस्म-ओ-रिवायात की बातें न करो
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अल्फ़ाज़ मदह-ख़्वाँ थे क़लम थे बिके हुए
कैसे तराश लेते कोई शाह-कार हम
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लोगों को अपनी फ़िक्र है लेकिन मुझे नदीम
बज़्म-ए-हयात-ओ-नज़्म-ए-गुलिस्ताँ की फ़िक्र है
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वक़्त मोहलत न देगा फिर तुम को
तीर जिस दम कमान से निकला
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हम-नफ़स ख़्वाब-ए-जुनूँ की कोई ता'बीर न देख
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
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