आदम शीर की कहानियाँ
एक चुप सौ दुख
(ये अफ़साना साइमा शाह की नज़्र है जिनसे मुकालमा इस अफ़साने का मुहर्रिक बना।) एक वक़्त आता है जब कुछ भी ठीक-ठीक याद नहीं रहता अगरचे कुछ न कुछ हमेशा याद रहता है और वो वक़्त मुझे हमेशा याद रहा जब उसने मुझसे कलाम किया था। ये एक तपते दिन की तपिश भरी शाम