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Akbar Allahabadi's Photo'

अकबर इलाहाबादी

1846 - 1921 | इलाहाबाद, भारत

उर्दू में हास्य-व्यंग के सबसे बड़े शायर , इलाहाबाद में सेशन जज थे।

उर्दू में हास्य-व्यंग के सबसे बड़े शायर , इलाहाबाद में सेशन जज थे।

अकबर इलाहाबादी

ग़ज़ल 136

नज़्म 7

अशआर 142

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ

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हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए

बी-ए हुए नौकर हुए पेंशन मिली फिर मर गए

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हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

हास्य 11

क़ितआ 37

रुबाई 69

क़िस्सा 8

पुस्तकें 78

चित्र शायरी 16

वीडियो 13

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ऑडियो 20

आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते

ख़त्म किया सबा ने रक़्स गुल पे निसार हो चुकी

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

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स्कॉलर 2

इंजन, कैंप और तोप: अकबर की शायरी में साम्राज्यवादी प्रतीक

अकबर इलाहाबादी उर्दू के वह अकेले शायर हैं जिन्होंने नई पश्चिमी ईजादों जैसे रेल, इंजन और तोप को महज़ चीज़ों के तौर पर नहीं, बल्कि औपनिवेशिक ताक़त और तहज़ीबी दबदबे के प्रतीकों के तौर पर बरता।

अकबर इलाहाबादी: सिर्फ़ एक हास्य-व्यंग्यकार या उपनिवेशवाद के महान आलोचक?

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की नज़र में अकबर इलाहाबादी सिर्फ़ एक दक़ियानूसी हास्य कवि नहीं थे, बल्कि वह उपमहाद्वीप में औपनिवेशिक व्यवस्था और साम्राज्यवादी हथकंडों को समझने वाले शुरुआती और सबसे महान विचारकों में से एक थे।

 

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