इंजन, कैंप और तोप: अकबर की शायरी में साम्राज्यवादी प्रतीक
अकबर इलाहाबादी उर्दू के वह अकेले शायर हैं जिन्होंने नई पश्चिमी ईजादों जैसे रेल, इंजन और तोप को महज़ चीज़ों के तौर पर नहीं, बल्कि औपनिवेशिक ताक़त और तहज़ीबी दबदबे के प्रतीकों के तौर पर बरता।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
हर एक से सुना नया फ़साना हम ने देखा दुनिया में एक ज़माना हम ने अव्वल ये था कि वाक़फ़ियत पे था नाज़ आख़िर ये खुला कि कुछ न जाना हम ने
अकबर इलाहाबादी उर्दू के वह अकेले शायर हैं जिन्होंने नई पश्चिमी ईजादों जैसे रेल, इंजन और तोप को महज़ चीज़ों के तौर पर नहीं, बल्कि औपनिवेशिक ताक़त और तहज़ीबी दबदबे के प्रतीकों के तौर पर बरता।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की नज़र में अकबर इलाहाबादी सिर्फ़ एक दक़ियानूसी हास्य कवि नहीं थे, बल्कि वह उपमहाद्वीप में औपनिवेशिक व्यवस्था और साम्राज्यवादी हथकंडों को समझने वाले शुरुआती और सबसे महान विचारकों में से एक थे।
अल्लामा इक़बाल
दाग़ देहलवी
अली सरदार जाफ़री
इस्माइल मेरठी
अमीर मीनाई
मीर तक़ी मीर
मुनीर शिकोहाबादी
रियाज़ ख़ैराबादी
क़तील शिफ़ाई
मिर्ज़ा ग़ालिब
अल्ताफ़ हुसैन हाली
फ़िराक़ गोरखपुरी
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
रशीद लखनवी
अख़्तर अंसारी
जोर्ज पेश शोर
साहिर देहल्वी
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
लाला माधव राम जौहर
नज़ीर अकबराबादी