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तरक़्क़ी पसंदी और जदीदियत की कश्मकश
आज का संघर्ष इंसानी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल चरण में दाख़िल हो चुका है। यह टूटी हुई "क़द्रों" (मूल्यों) और बिखरी हुई "हक़ीक़त" का टकराव जीवन की विरोधी धारणाओं को तोड़ता हुआ ख़ून की एक-एक बूंद में समा गया है। यह अच्छाई और बुराई का, साम्यवाद और पूंजीवाद
क्या जदीदियत की इस्तिलाह अब भी बा-मानी है?
आज का विषय काफ़ी चुनौतीपूर्ण है। मुख्य शब्द है "अब भी" यानी कल तक जदीदियत (आधुनिकता) अर्थपूर्ण थी। इस्तलाहें (शब्दावलियां) अपने अर्थ कैसे खो देती हैं। मेरा यह सवाल इस बात की माँग करता है कि बहस अकादमिक स्तर पर हो यानी मुझे इसका जवाब देते हुए निहायत OBJECTIVE