बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ग़ज़ल 21
अशआर 5
दिलबरों के शहर में बेगानगी अंधेर है
आश्नाई ढूँडता फिरता हूँ मैं ले कर दिया
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इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है
कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा
ज़ुल्फ़ तेरी ने परेशाँ किया ऐ यार मुझे
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