फ़ैज़ान आरिफ़ के शेर
जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है
वहाँ पर भी घने जंगल रहे थे
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ये काएनात की तस्वीर ना-मुकम्मल है
अभी तो इस में बहुत रंग उस ने भरना है
मिरा मिज़ाज नहीं है मगर मुझे 'फैज़ान'
किसी के वास्ते इक अहद से मुकरना है
मैं चुप नहीं हूँ किसी मस्लहत के पेश-ए-नज़र
मैं जानता हूँ कहाँ इख़्तिलाफ़ करना है
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टैग : आगही
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