फ़ारूक़ बाँसपारी
ग़ज़ल 7
अशआर 8
मिरे नाख़ुदा न घबरा ये नज़र है अपनी अपनी
तिरे सामने है तूफ़ाँ मिरे सामने किनारा
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यक़ीं मुझे भी है वो आएँगे ज़रूर मगर
वफ़ा करेगी कहाँ तक कि ज़िंदगी ही तो है
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ग़म-ए-इश्क़ ही ने काटी ग़म-ए-इश्क़ की मुसीबत
इसी मौज ने डुबोया इसी मौज ने उभारा
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मिरी ज़िंदगी का महवर यही सोज़-ओ-साज़-ए-हस्ती
कभी जज़्ब-ए-वालहाना कभी ज़ब्त-ए-आरिफ़ाना
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नदीम तारीख़-ए-फ़तह-ए-दानिश बस इतना लिख कर तमाम कर दे
कि शातिरान-ए-जहाँ ने आख़िर ख़ुद अपनी चालों से मात खाई
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ऑडियो 7
कभी बे-नियाज़-ए-मख़्ज़न कभी दुश्मन-ए-किनारा
कोहसार का ख़ूगर है न पाबंद-ए-गुलिस्ताँ
ख़ुशी से फूलें न अहल-ए-सहरा अभी कहाँ से बहार आई
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