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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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जानी लखनवी

1998 | लखनऊ, भारत

नई पीढ़ी के प्रसिद्ध शायर

नई पीढ़ी के प्रसिद्ध शायर

जानी लखनवी

ग़ज़ल 17

अशआर 5

अंधे भी बना लेते हैं तस्वीर सनम की

बीनाई पे मौक़ूफ़ नज़ारे नहीं होते

सहरा में हर किसी से नहीं होते मो'जिज़े

वो एड़ियाँ भी हैं जिन्हें ज़मज़म नहीं मिला

आसमानों में उड़ा करते थे इतराते थे

एक इक करके ज़मीनों के निवाले हुए लोग

इसी दरिया पे उदासी का बदन चूमते हैं

आख़िर-ए-शब तिरे दरवाज़े से टाले हुए लोग

मेरे लहजे से परेशानी है तुझ को सुन ले

मैं जो ख़ामोश रहूँगा तो ग़ज़ल बोलेगी

वीडियो 16

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