कालीदास गुप्ता रज़ा
अशआर 14
अज़ल से ता-ब-अबद एक ही कहानी है
इसी से हम को नई दास्ताँ बनानी है
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हम न मानेंगे ख़मोशी है तमन्ना का मिज़ाज
हाँ भरी बज़्म में वो बोल न पाई होगी
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चमन का हुस्न समझ कर समेट लाए थे
किसे ख़बर थी कि हर फूल ख़ार निकलेगा
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सामना आज अना से होगा
बात रखनी है तो सर दे देना
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ग़ज़ल 16
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अज़ल से ता-ब-अबद एक ही कहानी है
चुपके से दिमाग़ में दर आए
जब फ़िक्रों पर बादल से मंडलाते होंगे
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