मेहर ज़र्रीं के शेर
दिल में मिरी वहशत ने पर जितने निकाले थे
मैं ने उन्हें बल दे कर ज़ंजीर बनाई है
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फ़ना के होश फ़ना हैं हमारी वहशत से
वो होंगे और कि जिन पर फ़ना का ज़ोर चले
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बस्ती में भी कुछ ऐसे अंधेरे हैं जहाँ पर
झुलसे हुए जिस्मों का शबिस्तान हैं सड़कें
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ये अर्श से आना तो आग़ाज़-ए-मोहब्बत था
अब फ़र्श पे आए हैं अंजाम से खेलेंगे
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रौशन है दरख़्शाँ है हर अश्क ग़रीबों का
बस इन की बदौलत ही हर घर में दिवाली है
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मक़ाम-ए-आदमी कुछ कम नहीं है
फ़रिश्तों से तो कम आदम नहीं है
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