नातिक़ लखनवी
ग़ज़ल 25
अशआर 14
ऐ शम्अ' तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह
मैं ने तमाम उम्र गुज़ारी है इस तरह
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आँसुओं से ख़ून के अजज़ा बदलते जाएँगे
ऐ शम्अ' तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह
ख़ून-ए-दिल का जो कुछ अश्कों से पता मिलता है
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