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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नवीन जोशी

1967 | मुंबई, भारत

नवीन जोशी के शेर

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उस के माँ बाप नहीं हैं शायद

वर्ना उस में कहीं बच्चा होता

बख़्श मुझ को अधूरी कोई ने'मत मौला

या तो दरिया ही दे पूरा या तो सहरा सारा

इस दफ़ा तो ज़िंदगी जल्दी में थी

कह दो अगली बार फ़ुर्सत में मिले

मोहब्बत फ़क़त लफ़्ज़ था एक ख़ाली

ये किस ने कहा था मआ'नी मिला दो

वो नींद मिली है कि जो पूरी नहीं होती

वो ख़्वाब मिला है कि जो मा'ज़ूर हुआ है

रंज यूँ राह-ए-मसाफ़त में मिले

कुछ कमाए कुछ विरासत में मिले

धूप बढ़ने के जो आसार हुए

कितने साए के तरफ़-दार हुए

प्यार आँखों से छलकता ही है

दिल के पैमाने में सारा रहे

जज़्बात से ये सफ़र तय हुआ

दिल से कभी ये ज़बाँ तक गए

निशान राही के राहों पे हो हो लेकिन

निशान राहों के अक्सर मिलेंगे राही पे

कुछ वक़्त ज़रा और नहर दूध की लेगी

फ़रहाद को तेशा नहीं मंज़ूर हुआ है

अँधेरों उजालों की है ये लड़ाई

बुझाओगे तुम हम जलाया करेंगे

रह गए कितने किरदार भीतर मिरे

मेरे भीतर मिरा क़ाफ़िला रह गया

कि हासिल यही मौसमों का रहा

बहारों के पत्ते ख़िज़ाँ तक गए

फ़ासलों में रहा क़ुर्बतों का गुमाँ

क़ुर्बतों में कहीं फ़ासला रह गया

क्या ज़रूरी है ये इक़रार की मुहताज रहे

हम मोहब्बत को यूँ लाचार करें भी कि नहीं

रहूँगा जश्न-ज़दा मैं बहाने क्या कम हैं

तू रक़्स देखना मेरा मिरी तबाही पे

तुम ने पौदे को था साए में रखा

धूप में रखते तो ज़िंदा होता

है वजूद उस का जो काग़ज़ पे करे साबित ये

बाज़ औक़ात है काग़ज़ बड़ा औक़ात से अब

यही दाइमी मश्ग़ला है हमारा

नई चीज़ ले लो पुरानी मिला दो

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