निज़ामुद्दीन निज़ाम के शेर
वही जो आधी रात को चराग़ बन के जल उठा
किसी की याद का नहीं वो ज़ख़्म का निशान है
ज़मीन की कशिश का जाल तोड़ कर निकल गईं
मगर ये तय है चियूँटियों की आख़िरी उड़ान है
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