राशिद तराज़ के शेर
लोग पत्थर के थे फ़रियाद कहाँ तक करते
दिल के वीराने हम आबाद कहाँ तक करते
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कुछ तो हो जाती तसल्ली दिल-ए-पज़-मुर्दा को
घर की वीरानी जो सामान-ए-तमाशा होती
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सारी रौनक़ तिरे होने के यक़ीं में है निहाँ
तू न होता तो भला काहे को दुनिया होती
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टैग : दुनिया
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