सज्जाद शम्सी
चित्र शायरी 1
दुआओं में असर बाक़ी न आहों में असर बाक़ी है कुछ ले दे के गर बाक़ी तो है इक चश्म-ए-तर बाक़ी ये कैसा हादसा गुज़रा ये कैसा सानेहा बीता न आँगन है न छत बाक़ी न हैं दीवार-ओ-दर बाक़ी चमन वालों की बद-ज़ौक़ी पे कलियाँ जान खोती हैं न हैं अहल-ए-नज़र बाक़ी न कोई दीदा-वर बाक़ी पता क्या पूछते हैं आप हम सहरा-नवर्दों से न अपना शहर है बाक़ी मोहल्ला है न घर बाक़ी फ़ज़ाएँ चुप हवाएँ चुप सदाएँ चुप निदाएँ चुप नवा-ए-नीम-शब बाक़ी न है बाँग-ए-सहर बाक़ी ख़ुदा जाने निज़ाम-ए-मय-कदा को क्या हुआ 'शमसी' न वो हुस्न-ए-अता बाक़ी न वो लुत्फ़-ए-नज़र बाक़ी
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