सदार ख़ान सोज़ के शेर
कहने पे मिरे आओ मिरे पास तो बैठो
वो उन के बिगड़ने की अदा याद है अब तक
शानों पे मिरे वस्ल की शब ख़ास अदा से
रहती थी तिरी ज़ुल्फ़-ए-रसा याद है अब तक
मुद्दत हुई उस को कि मिरी ख़ल्वत-ए-शब में
पैग़ाम जो लाई थी सबा याद है अब तक
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