शफ़क़ इमादपुरी के शेर
क़यामत से नहीं कम इंतिज़ार-ए-वस्ल की लज़्ज़त
ख़ुदा जाने कहीं वा'दा वफ़ा होता तो क्या होता
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere