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शमीम हनफ़ी

1939 - 2021 | दिल्ली, भारत

अग्रणी उर्दू आलोचक और भारतीय संस्कृति के विद्वान

अग्रणी उर्दू आलोचक और भारतीय संस्कृति के विद्वान

शमीम हनफ़ी

लेख 50

ड्रामा 4

 

अशआर 6

मैं ने चाहा था कि लफ़्ज़ों में छुपा लूँ ख़ुद को

ख़ामुशी लफ़्ज़ की दीवार गिरा देती है

शाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं

मैं इस ठंडक से घबरा कर अपनी आग में जलने लगा

बंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर देख

डूबती आँखों से अपने शहर का मंज़र देख

तमाम उम्र नए लफ़्ज़ की तलाश रही

किताब-ए-दर्द का मज़मूँ था पाएमाल ऐसा

बुलंदियाँ आसमाँ की सूरत ज़मीन के पाँव चूमती हैं

ज़मीन शायद बुलंद-तर थी ज़मीन ही में उतर गया वो

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ग़ज़ल 31

नज़्म 1

 

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वीडियो 52

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ऑडियो 20

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

आना उसी का बज़्म से जाना उसी का है

इस तरह इश्क़ में बर्बाद नहीं रह सकते

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