ताबाँ अब्दुल हई
ग़ज़ल 48
अशआर 67
कई फ़ाक़ों में ईद आई है
आज तू हो तो जान हम-आग़ोश
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दर्द-ए-सर है ख़ुमार से मुझ को
जल्द ले कर शराब आ साक़ी
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एक बुलबुल भी चमन में न रही अब की फ़सल
ज़ुल्म ऐसा ही किया तू ने ऐ सय्याद कि बस
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जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब
रौशनाई शम्अ की फीकी नज़र आती है सुब्ह
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चित्र शायरी 2
ऑडियो 9
ग़म में रोता हूँ तिरे सुब्ह कहीं शाम कहीं
ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज
तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है
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