वली दकनी
ग़ज़ल 40
अशआर 27
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
उसे ज़िंदगी क्यूँ न भारी लगे
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ए'तिबार खोती है
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याद करना हर घड़ी तुझ यार का
है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का
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चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त
जा तमाशा देख उस रुख़्सार का
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ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
तुझ लब की सिफ़त ला'ल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा
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