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Wali Dakni's Photo'

वली दकनी

1667 - 1707 | गुजरात, भारत

दिल्ली में उर्दू शायरी को स्थापित करने वाले क्लासिकी शायर

दिल्ली में उर्दू शायरी को स्थापित करने वाले क्लासिकी शायर

वली दकनी

ग़ज़ल 40

अशआर 28

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे

उसे ज़िंदगी क्यूँ न भारी लगे

मुफ़लिसी सब बहार खोती है

मर्द का ए'तिबार खोती है

याद करना हर घड़ी तुझ यार का

है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का

चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त

जा तमाशा देख उस रुख़्सार का

फिर मेरी ख़बर लेने वो सय्याद न आया

शायद कि मिरा हाल उसे याद न आया

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पुस्तकें 21

वीडियो 7

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ऑडियो 5

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे

तुझ लब की सिफ़त ला'ल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

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स्कॉलर 5

वली दकनी की वफ़ात की तारीख़: हक़ीक़त और दिल्ली की अदबी सियासत

वली दकनी की वफ़ात की तारीख़ तय करना सिर्फ़ एक तारीख़ी बहस नहीं है, बल्कि इसके पीछे दिल्ली के तज़किरा-निगारों की गहरी अदबी सियासत काम कर रही है।

शाह गुलशन का मशवरा: वली दकनी के ख़िलाफ़ गढ़ा गया एक अदबी अफ़साना

वली दकनी को शाह गुलशन की तरफ़ से रेख़्ता-गोई (उर्दू शायरी) में फ़ारसी विषयों को बाँधने के मशवरे की कहानी दरअस्ल दिल्ली के तज़किरा निगारों (इतिहासकारों) की मनगढ़ंत उपज है।

दिल्ली के शुरुआती शायरों द्वारा वली दकनी की अज़मत (महानता) का हिचकिचाहट भरा एतिराफ़ (स्वीकार)

दिल्ली के शुरुआती शायरों ने वली दकनी के असर को महसूस तो किया, लेकिन इलाक़ाई भेदभाव के कारण उनकी बरतरी (श्रेष्ठता) को खुले दिल से मानने में हिचकिचाहट का शिकार रहे।

 

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