ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल 49
अशआर 38
समझेंगे न अग़्यार को अग़्यार कहाँ तक
कब तक वो मोहब्बत को मोहब्बत न कहेंगे
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उन को हाल-ए-दिल-ए-पुर-सोज़ सुना कर उट्ठे
जहाँ में कौन कह सकता है तुम को बेवफ़ा तुम हो
जाते हो तुम जो रूठ के जाते हैं जी से हम
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