deewan-e-aabru

आबरू शाह मुबारक

इदारा-ए-तसनीफ़, अलीगढ़
| अन्य

पुस्तक: परिचय

परिचय

شاہ مبارک آبرو کی ابتدائی شاعری محمد شاہی دور کی آئینہ دار ہے۔ چونکہ مزاجا وہ حسن پرست تھے۔ لہٰذا خوبصورت چیزوں سے انہیں دلچسپی تھی۔ ایہام گوئی کے باوجود ان کی شاعری میں خلوص، سچائی اور سادگی سے اظہار جذبات کی مثالیں بھی ملتی ہیں۔ فارسی شاعر ی کے اثرات بھی نمایاں محسوس ہوتے ہیں، ساتھ ہی ساتھ ہندی کے اثرات بھی دکھائی دیتے ہیں۔ آبرو کا زمانہ محمد شاہی کا زمانہ تھا ۔بادشاہ کو نہ معاشرے کی تنظیمِ و تعمیر سے سروکار تھا نہ امورِ سلطنت اور نہ ہی اس کی حفاظت اور انتظام وانصرام سے کوئی غرض تھی۔ وہ ہر چیز سے بے نیاز رنگ رلیاں منانے میں مصروف تھا۔ اس کے ساتھ پورا معاشرہ حالتِ مد ہوشی میں تھا۔ ہر طرف رقص و سرور اور موسیقی کی محفلیں گرم تھیں۔ خوش وقتی ، حسن پرستی عاشق مزاجی ، امرد پرستی اورمئے نوشی کے لوازمات کے ساتھ یہ مجلس آرائی، زندگی سے وقتی لذت ، جسمانی لطف و نشاط حاصل کرنے کا ذریعہ تھی۔ آبرو اسی مجلسی زندگی کے شاعر تھے۔ان کا پورا دیوان اسی تہذیب کا آئینہ ہے۔ ایہام گوئی ، رعایتِ لفظی اور روز مرہ کے مشاہدات کا اظہار اسی مجلسی ماحول کا حصہ ہیں۔اہلِ مجلس آبرو کی شاعری کو سن کر اپنی یادوں کا لطف لیتے تھے کیوں کہ آبرو ان کے تجربوں کو بیان کرتے تھے۔ زیر نظر دیوان کو محمد حسن نے مرتب کیا ہے۔ جس میں ان کی حالات زندگی کے علاوہ طرز کلام پر بھی روشنی ڈالی ہے۔

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लेखक: परिचय

आबरू शाह मुबारक

आबरू शाह मुबारक


रेख़्ता में उत्तर भारत का पहला साहब-ए-दीवान शायर

उत्तर भारत में उर्दू शायरी को रिवाज देने वालों में आबरू को प्राथमिकता का सम्मान प्राप्त है। उनसे पहले वली और दकन के कुछ दूसरे शायर उर्दू में शायरी कर रहे थे लेकिन उत्तर भारत में शायरी की असल ज़बान फ़ारसी थी। उर्दू शायरी महज़ तफ़रीहन मुँह का मज़ा बदलने के लिए की जाती थी। फिर जब 1720 ई. में वली का दीवान दिल्ली पहुंचा और उसके अशआर ख़ास-ओ-आम की ज़बान पर जारी हुए तो जिन लोगों ने सबसे पहले रेख़्ता को अपने काव्य अभिव्यक्ति का ख़ास माध्यम बनाया उनमें फ़ाइज़, शरफ़ उद्दीन मज़मून, मुहम्मद शाकिर नाजी और शाह मुबारक आबरू सर्वोपरि थे। उनके इलावा, यकरंग एहसान उल्लाह ख़ां और हातिम भी फ़ारसी को छोड़कर उर्दू में शायरी करने लगे थे। लेकिन इन सब में आबरू का एक विशेष स्थान था। वो अपने ज़माने में ज़बान रेख़्ता के सिद्ध शायर और साहिब-ए-ईजाद नज़्म-ए-उर्दू शुमार होते थे। शोधकर्ताओं ने प्राथमिकता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा की है जिनका विश्लेषण करने के बाद डाक्टर मुहम्मद हुसैन कहते हैं, “इस बहस से ये नतीजा निकालना ग़लत न होगा कि फ़ाइज़ की मौजूदा कुल्लियात जो संशोधन के बाद संकलित हुई, उत्तर भारत में उर्दू का पहला दीवान क़रार देने के लिए हमारे पास निर्णायक और ठोस तर्क मौजूद नहीं हैं। फ़ाइज़ के बाद प्राथमिकता का विशेष अधिकार आबरू और हातिम को मिलता है। हातिम का दीवान उपलब्ध नहीं, सिर्फ़ संशोधन के बाद संकलित किया गया ‘दीवान ज़ादा’ मिलता है। इस सूरत में आबरू का दीवान निश्चित उत्तर भारत में उर्दू का पहला प्रमाणिक दीवान है।” आबरू ने शे’र कहना  उस वक़्त शुरू किया था जब शायरी में फ़ारसी का सिक्का चलता था और बाद के फ़ारसी के शायरों का कलाम मक़बूल था। आबरू ने फ़ारसी और बृज दोनों के रंग-ओ-आहंग के प्रभाव को स्वीकार किया और अपने दौर के मिज़ाज को पूरी तरह अपनाया और उसको रेख़्ता में अभिव्यक्त किया और ये अभिव्यक्ति उस बेसाख़्तगी और बांकपन से हुई जो मुहम्मद शाही दौर की विशेषता है। समस्त तज़किरा लेखक इस बात से सहमत हैं कि आबरू उर्दू में ईहामगोई के आविष्कारक न सही उसको रिवाज देने और उसे सिक्का-ए-राइज-उल-वक़्त बनाने वालों में उनका नाम सर्वोपरि है। उर्दू में पहला वासोख़्त लिखने का शरफ़ भी आबरू को हासिल है।

आबरू की ज़िंदगी के हालात के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हैं। बस इतना मालूम है कि उनका नाम नज्म उद्दीन उर्फ़ शाह मुबारक था। मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग मुहम्मद ग़ौस गवालियारी के पोते थे और इस वास्ते से मशहूर फ़ारसी के विशेषज्ञ और विद्वान ख़ान आरज़ू के रिश्तेदार और शागिर्द थे। आबरू 1683 ई. में गवालियार में पैदा हुए और जवानी में 1706 ई. के आस-पास दिल्ली आकर शाही मुलाज़मत से समबद्ध हो गए। इसी मुलाज़मत के सिलसिले में कुछ अर्सा फ़तह अली गर्देज़ी, साहिब-ए-तज़किरा गर्देज़ी के वालिद की संगत में नारनौल में भी रहे। इसके बाद वो दिल्ली आ गए। आबरू ने मुलाज़मत के दौरान इज़्ज़त और दौलत हासिल की और उनका शुमार ख़ुशहाल लोगों में होता था। एक आँख से विकलांग थे। दाढ़ी लंबी थी और हाथ में छड़ी लेकर चलते थे। आख़िरी उम्र में दरवेश और क़लंदर मशहूर थे। समकालीन शायरों में मज़हर जान जानां और बेनवा से उनकी नोक-झोंक चलती थी। उनके विरोधी प्रायः उनकी शायरी की बजाय उनकी आँख की ख़राबी को उपहास का निशाना बनाते थे। मज़हर जान जानां ने कहा, 
आबरू की आँख में इक गाँठ है
आबरू सब शायरों की गाँड है

इसके जवाब में आबरू ने कहा,
जब सती सत पर चढ़े तो पान खाना रस्म है
आबरू जग में रहे तो जान जाना पश्म है

इसी तरह इक शायर ‘बेनवा’ थे इलाहाबाद से दिल्ली वारिद हुए थे। एक मुशायरे में उनकी मुलाक़ात आबरू से हुई तो आबरू ने उन पर कोई ख़ास तवज्जो न दी जिससे ‘बेनवा’ की अना को चोट पहुंची और उन्होंने आबरू से कहा, ''मियां आबरू साहिब, आप मुख़लिसों के अहवाल से इस क़दर तग़ाफ़ुल करते हैं जैसे आपकी आँख में हमारी कोई जगह नहीं।” इस पर हाज़िरीन-ए-मजलिस हंस पड़े। यही नहीं आबरू के इस शे’र पर, 
तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है
कहाँ है किस तरह की है किधर है 

पर चोट करते हुए ‘बेनवा’ ने कहा, “काने ने क्या अंधा शे’र कहा है।” ये वही ‘बेनवा’ हैं जिन्होंने मीर तक़ी मीर पर अपने “दो आबे” वाले मज़मून के सरक़ा का इल्ज़ाम लगाया था और उन्हें बुरा-भला कहा था। आबरू हुस्नपरस्त और आशिक़ मिज़ाज थे। सय्यद शाह कमाल के बेयर मियां मक्खन पाक बाज़ पर ख़ास नज़र थी। दीवान आबरू में उनके हवाले से कई शे’र मिलते हैं, जैसे; 
मक्खन मियां ग़ज़ब हैं फ़क़ीरों के हाल पर
आता है उनको जोश-ए-जमाली कमाल पर

अपनी लतीफ़ेबाज़ी के लिए मशहूर मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने आब-ए-हयात में यहां तक लिख दिया कि “इन (आबरू) के शे’र जब तक मक्खन मियां पाकबाज़ के कलाम से ना चुपड़े जाएं, मज़ा न देंगे।” पाकबाज़ के इलावा भी उन्होंने सुबहान राय, रमज़ानी, साहिब राय, क़साई, सुनार और मुख़्तलिफ़ पेशों से सम्बंध रखने वाले महबूबों का ज़िक्र अपने कलाम में किया है। औरतों में अपने वक़्त की मशहूर तवाएफ़ों, जैसे पन्ना ममोला, जमाल वग़ैरा का जो उस ज़माने में Celebrity का दर्जा रखती थीं, तज़किरा उनके अशआर में मिलता है। नृत्य व संगीत से आबरू को ख़ास लगाव था। सदारंग दरबार-ए-शाही के ख़ास बीन नवाज़ थे जिनसे आबरू को दिली ताल्लुक़ था। सदारंग कुछ अर्सा के लिए आगरा चले गए तो आबरू ने कहा, 
भूलोगे तुम अगर जो सदा रंग जी हमें
तो नाँव बीन-बीन के तुमको धरेंगे हम 

औरतों के साथ उनके सम्बंध यौन से अधिक उनके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए था। वो उन औरतों की तारीफ़ उनके फ़न के हवाले से करते नज़र आते हैं;
मीठे बचन सुना दे, तूती को तब लजा दे
जब नाचने पे आवे तब मोर है ममोला 
       या 
ख़ुदा तुझे भी करे, बाग़ बीच रंग के, सब्ज़ 
तिरी सदा ने किया है हमें निहाल जमाल 
     या 
क़ियामत राग, ज़ालिम भाव,काफ़िर गत है ऐ पन्ना 
तुम्हारी चीज़ सो देखी सो इक आफ़त है ऐ पन्ना

आबरू की सारी शख़्सियत और कलाम मुहम्मद शाही दौर की सरमस्ती में डूबा हुआ है। खेलों में गंजिंफ़ा और कबूतरबाज़ी का शौक़ था। अच्छे लिबास और क़ीमती पोशाकों के शौक़ीन थे। अपनी महबूबाओं के जिस्म पर उन क़ीमती कपड़ों का तज़किरा भी उनके कलाम में जगह जगह मिलता है। कहा जाता है कि आख़िरी उम्र में सब कुछ छोड़ छाड़ कर दरवेश बन गए थे लेकिन आख़िरी उम्र को बुढ़ापे पर संदेह करना ग़लत होगा क्योंकि आबरू ने सिर्फ़ पच्चास बरस की उम्र पाई और मुसहफ़ी के मुताबिक़ 1733 ई. में घोड़े के लात मार देने से उनका देहांत हुआ। उनकी क़ब्र दिल्ली में सय्यद हसन रसूल नुमा के नज़दीक है।

आबरू की शायरी अपने दौर की तर्जुमान है और नज़्म में एक तारीख़ी दस्तावेज़ है। उनकी शायरी पढ़ कर इस पतनशील समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर आँखों के सामने घूम जाती है। इश्क़ जो ग़ज़ल का ख़ास मौज़ू है, उनके दौर में महबूब की जुदाई में रोने कुढ़ने का नाम नहीं था। न ये छुपाने और दिल में रखने की चीज़ था। मुख़्तलिफ़ दर्जात की बाज़ारी औरतें आम थीं और जितना संभव हो उनसे लाभ उठाया जा सकता था। अम्रद परस्ती(बच्चा बाज़ी) को इशक़-ए-मजाज़ी और इस तरह इशक़-ए-हक़ीक़ी की पहली मंज़िल क़रार देते हुए तक़द्दुस हासिल था। ख़ूबसूरत लौंडे किसी का माशूक़ बनने के इच्छुक रहते थे, इसलिए आबरू ने एक मसनवी “दर मौइज़ा मा’शूकां”  इसी विषय पर लिखी जिसमें माशूक़ बनने के अनिवार्य तत्वों को बताया गया है। अपने दौर के हवाले से ये मसनवी उर्दू में एक अनोखी और अलग मसनवी है। आबरू और रेख़्ता में उनके समकालीन शायरों का ख़ास कारनामा ये है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को फ़ारसी के शिकंजे से आज़ाद किया। उनकी कोशिश थी कि उर्दू शायरी को हिंदुस्तानी रंग में रंगा जाये। इसके मज़ामीन और अंदाज़-ए-बयान हिंदुस्तानी हों। कुछ शायरों जैसे यकरंग ने शे’र में फ़ारसी इज़ाफ़तों का इस्तेमाल भी तर्क कर दिया। ये लोग उर्दू शायरी को एक अलग और विशिष्ट पहचान देना चाहते थे जिसमें ईरानियत के बजाय हिंदुस्तानियत हो;
ख़ुश यूँ ही क़दम शेख़ का है मो’तक़िदाँ को
जूं किशन को कब्जा का लगे कूब प्यारा
       या 
मिरा ऐ माहरू क्यों ख़ून अपने सर चढ़ाते हो
रक्त चंदन का यूं किस वास्ते टीका लगाते हो
       या
तेरे ज़नान पन की नाज़ुक है शक्ल बंधनी
तस्वीर पद्मिनी की अब चाहिए चतुरनी

रेख़्ता में फ़ारसी शब्द व क्रिया के इस्तेमाल को बुरा जानते थे। इसलिए आबरू ने कहा,
वक़्त जिनका रेख़्ता की शायरी में सर्फ़ है
उन सती कहता हूँ बूझो सिर्फ़ मेरा झर्फ़ है

जो कि लावे रेख़्ता में फ़ारसी के फे़’ल-ओ-हर्फ़
लग़व हैंगे फे़’ल उसके रेख़्ता में हर्फ़ है 

ये वो लोग थे जिन्होंने शायरी को अवाम पसंद बनाया और शायरी का चर्चा घर-घर हो गया। आबरू पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने ईहाम गोई को बढ़ावा दिया लेकिन इस बात को भुला दिया जाता है कि ये उनकी ज़रूरत या मजबूरी थी। आबरू और उनके समकालीन रेख़्ता को हिंदुस्तानी रँग देना चाहते थे और हिंदी का श्लेष अलंकार (उर्दू में ईहाम) अवाम को उस शायरी की तरफ़ मुतवज्जा करने का अच्छा माध्यम था। ठीक यही स्थिति हमें बहुत बाद में लखनवी शायरी में मिलती है कि जब लखनऊ के शायरों ने देहलवी शायरी का जुआ अपने सर से उतार फेंकने की कोशिश की तो रिआयत-ए-लफ़्ज़ी में पनाह ली और उनको बेपनाह मक़बूलियत मिली लेकिन ऐसा भी नहीं कि आबरू में ईहाम के सिवा कुछ न हो। आबरू की शायरी की ख़ुसूसियत ख़ुशवक़्ती और मज़ेदारी है। उन्होंने ज़माने के उतार-चढ़ाव देखे और उनके निशानात उनकी शायरी में जगह जगह मिलते हैं। उनकी शायरी की फ़िज़ा तमामतर मजलिसी है। डाक्टर मुहम्मद हसन के शब्दों में आबरू सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयान का नहीं बल्कि एक शख़्सियत, एक मिज़ाज और एक दौर का नाम है और उस दौर में उस शख़्सियत और उस मिज़ाज का एक अपना नशा है, उसमें अज़मत न सही मज़ा ज़रूर है, परिपक्वता न सही चाशनी ज़रूर है।

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