पहचान: प्रसिद्ध इक़बाल विशेषज्ञ, शोधकर्ता, आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस
प्रोफेसर अब्दुल हक़ की जन्मतिथि के संबंध में काफी मतभेद पाए जाते हैं, हालांकि नाज़िया रईस ने अपनी पुस्तक ‘प्रोफेसर अब्दुल हक़: मुनफ़रिद इक़बाल शनास’ में लिखा है कि “स्कूल के रिकॉर्ड, आपसी बातचीत और विभिन्न पुस्तकों के आधार पर मुझे उनकी जन्मतिथि के सही प्रमाण मिले, और उनकी सही जन्मतिथि 4 रबीउल अव्वल 1358 हिजरी, अनुसार 24 अप्रैल 1939 है।”
प्रोफेसर अब्दुल हक़ उत्तर प्रदेश के ज़िला जौनपुर के कस्बा मछलीशहर के एक गांव पहाड़पुर में पैदा हुए। उनकी प्रारंभिक परवरिश पूरी तरह धार्मिक और ग्रामीण वातावरण में हुई। उन्होंने गवर्नमेंट सिटी हाई स्कूल और गवर्नमेंट कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबंध स्थापित किया, जहां उन्हें प्रोफेसर महमूद इलाही जैसे शिक्षकों का सान्निध्य मिला। प्रोफेसर महमूद इलाही की निगरानी में उन्होंने पीएचडी पूरी की और कम उम्र में ही दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से जुड़ गए। शुरुआत अंशकालिक अध्यापन से हुई, बाद में 1968 में वे पूर्णकालिक रूप से विभाग का हिस्सा बने और लगभग चालीस वर्षों तक अध्यापन और शोध सेवाएं देते रहे।
उनके अकादमिक जीवन का सबसे उज्ज्वल पक्ष ‘इक़बाल शनासी’ है। प्रोफेसर अब्दुल हक़ का नाम वर्तमान दौर के सबसे विश्वसनीय इक़बाल विशेषज्ञों में लिया जाता है। उन्होंने अल्लामा इक़बाल की शायरी और विचारधारा को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘इक़बाल के इब्तिदाई अफकार’, ‘फ़िक्र-ए-इक़बाल की सरगुज़श्त’, ‘इक़बाल का शेअरी उस्लूब’ और ‘इक़बाल की ग़ालिब शनासी’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं।
प्रोफेसर अब्दुल हक़ की सेवाएं केवल लेखन और संपादन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध की एक नई परंपरा स्थापित की। उनकी निगरानी में अनेक विद्यार्थियों ने इक़बालियत और अन्य विषयों पर पीएचडी पूरी की। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे अकादमिक दुनिया में अत्यंत सक्रिय हैं और अब तक उनकी तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।