aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
यह मशहूर उर्दू शायर अहसान दानिश का पहला शे'री मजमूआ है। इसमें दिलगुदाज़ नज़्में शामिल हैं जो अक्सर इंसानी मुआशरत के बीमार पहलुओं की अकासी करती हैं और शायर की माहिराना हुनरमंदी को ज़ाहिर करती हैं।
एहसानुल-हक़ (1911-1982) ज़िन्दगी का हौसला और जोश बढ़ाने वाली शाइरी के लिए मशहूर। कान्धला, मुज़फ़्फ़र नगर (उत्तर प्रदेश) में जन्म। ग़रीबी ने चौथी क्लास से आगे न पढ़ने दिया। घर चलाने के लिए मज़्दूरी करने लगे। 15 साल की उम् में लाहौर जा बसे और वहाँ भी मज़्दूरी, चौकीदारी और बाग़बानी जैसे काम किए। फिर एक बुक डिपो में नौकरी मिल गई। इन सब कामों के बीच पढ़ाई भी की और शाइरी भी। ‘ताजवर’ नजीबाबादी के शागिर्द थे।