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पुस्तक: परिचय

اکبر الہ آبادی اُردو ادب میں باضابطہ طنز و مزاح کے پہلے شاعر تسلیم کیے جاتے ہیں۔ طنز و مزاح کی شاعری کے ذریعہ وہ قوم کو برائیوں سے باہر نکالنے کی اور قوم کی اصلاح کرنے کی کوشش کرتے ہیں۔ زیر تبصرہ کتاب "اکبر کی شاعری کا تنقیدی مطالعہ"، صغری مہدی کی ایک اہم تصنیف ہے۔ اس کتاب کو لکھنے کے لیے مصنف اکبر کے کلام کا، ان کی شخصیت کا اور ان کے عہد کا بغور مطالعہ کیا اور ان تمام مواد کو حاصل کرنے کی کوشش کی جو اکبر الہ آبادی کے فن اور شخصیت کے حوالے سے موجود تھے۔ مصنفہ نے اس کتاب کے ذریعے قارئین کو یہ باور کرانے کی کوشش کی ہے کہ اکبر اونچے درجے کے شاعر، ایک ہمدرد مصلح اور باشعور انسان ہیں۔ وہ مغربی تہذیب کے مخالف نہیں بلکہ اس کے ناقد ہیں گویا مصنفہ نے اس کتاب کے ذریعے اس عام راے کو خارج کرنے کی کوشش کی ہے کہ اکبر مغربی تہذیب کے مخالف ہیں۔ یہ کتاب کل سات ابواب پر مشتمل ہے۔

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लेखक: परिचय

पहचान: प्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार, सामाजिक कार्यकर्ता और महिलाओं के अधिकारों तथा समस्याओं की प्रभावशाली आवाज़

सुग़रा मेहदी का जन्म 8 अगस्त 1937 (या 1938; कुछ स्रोतों में 1927 भी दर्ज है) को भोपाल में हुआ। उनका वास्तविक नाम इमामत फ़ातिमा था, लेकिन बाद में परिवार की एक बुज़ुर्ग महिला ने उनका नाम बदलकर “सुग़रा” रख दिया और यही नाम आगे चलकर उनकी साहित्यिक पहचान बन गया। वे प्रसिद्ध विद्वान सैयद आबिद हुसैन की भांजी थीं और बचपन से ही ऐसे वातावरण में पली-बढ़ीं जहाँ शिक्षा, साहित्य, सामाजिक चेतना और महिलाओं के कल्याण को विशेष महत्व दिया जाता था।

सुग़रा मेहदी ने अपना बचपन कस्बा बारी (बाड़ी) और गांव दाईपुर (दाचीपुर), ज़िला भोपाल, मध्य प्रदेश में बिताया। उस समय की परंपरा के अनुसार उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, बाद में उन्हें बारी के स्कूल में दाखिल कराया गया। 1950 में वे दिल्ली आ गईं और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा हासिल की। उन्होंने अध्यापन, अनुवाद, रेडियो स्क्रिप्ट लेखन और संपादन जैसे क्षेत्रों में भी काम किया। 1977 में वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभाग से जुड़ीं और 1997 में सेवानिवृत्त हुईं। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘हिकायत-ए-हस्ती’ (2006) में बड़ी बेबाकी से अपने जीवन के उतार-चढ़ाव और अपने वैचारिक विकास को दर्ज किया, जो भारतीय मुस्लिम महिला की आत्म-अभिव्यक्ति की एक महत्वपूर्ण मिसाल मानी जाती है।

उनकी साहित्यिक यात्रा कम उम्र में ही शुरू हो गई थी। आठवीं कक्षा में उन्होंने बच्चों की पत्रिका ‘खिलौने’ के लिए ‘हिम्मत का फल’ शीर्षक से अपनी पहली कहानी लिखी। इसके बाद उनकी रचनाएँ ‘बीसवीं सदी’, ‘बानो’, ‘आजकल’, ‘सब रस’ और अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।

उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पत्थर का शहज़ादा’ 1975 में प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें उर्दू कहानी की नई आवाज़ के रूप में स्थापित किया। इसके बाद ‘जो मेरे वो राजा के नहीं’, ‘पहचान’ और ‘पेशगोई’ जैसे महत्वपूर्ण कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए। उनका हिंदी कहानी-संग्रह ‘गुलाबों वाला बाग’ भी साहित्यिक हलकों में सराहा गया।

उपन्यास लेखन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। उनका पहला लघु-उपन्यास ‘कोई दर्द आशना भी नहीं’ 1969 में प्रकाशित हुआ, जबकि पहला उपन्यास ‘पा-बे-जौलाँ’ 1972 में सामने आया। इसके अलावा ‘धुंध’, ‘परवाई’, ‘राग भोपाली’ और ‘जो बचे हैं संग समेट लो’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं।

सुग़रा मेहदी ने उर्दू साहित्य में स्त्री चेतना को संतुलित, गरिमामय और वैचारिक दिशा प्रदान की। उनकी रचनाओं में स्त्री केवल पीड़ित पात्र नहीं बल्कि सोचने, निर्णय लेने और अपनी पहचान बनाने वाली संवेदनशील मनुष्य के रूप में सामने आती है। उन्होंने मुस्लिम मध्यमवर्गीय महिलाओं के जीवन, उनके मानसिक संघर्ष, पारिवारिक दबाव, विवाह, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे विषयों को गहराई और सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया। उनकी शैली भावनात्मक तीव्रता, मनोवैज्ञानिक दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना से भरपूर है। वे पश्चिमी स्त्रीवाद की अतिरेकी धारणाओं के बजाय ऐसी वैचारिक स्वतंत्रता की पक्षधर थीं जो पूर्वी संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक संतुलन के अनुरूप हो।

कहानी और उपन्यास लेखन के अलावा सुग़रा मेहदी ने आलोचना, शोध, जीवनी और यात्रा-वृत्त लेखन में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी पुस्तक ‘उर्दू उपन्यासों में औरत की सामाजिक हैसियत’ उर्दू कथा साहित्य में स्त्री पात्रों के अध्ययन की महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है। उन्होंने ‘अदबी मज़ामीन’, ‘हमारी जामिया’ और कई साहित्यिक एवं जीवनीपरक पुस्तकें भी लिखीं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इतिहास, विशेष रूप से महिलाओं की सेवाओं को सुरक्षित रखने में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। वे कई वर्षों तक पत्रिका ‘जामिया’ और ‘इस्लाम और अस्र-ए-जदीद’ से जुड़ी रहीं और संपादन का कार्य करती रहीं।

सुग़रा मेहदी केवल साहित्यकार ही नहीं बल्कि सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और कानूनी सुरक्षा के लिए सक्रिय संघर्ष किया। ‘मुस्लिम वीमेंस फ़ोरम’ के माध्यम से उन्होंने महिलाओं की समस्याओं पर आवाज़ उठाई, सेमिनारों और कानूनी बहसों में हिस्सा लिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि महिलाओं की स्वतंत्रता शिक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी हुई है।

निधन: सुग़रा मेहदी का निधन 17 मार्च 2014 को दिल्ली में हुआ।

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