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पहचान: इस्लामी चिंतक, क़ुरआन के व्याख्याकार, पत्रकार, लेखक, जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक
सैयद अबुल आला मौदूदी भारतीय उपमहाद्वीप के उन महान इस्लामी चिंतकों में गिने जाते हैं जिन्होंने बीसवीं सदी में इस्लामी विचार, धार्मिक चेतना और दीन के पुनरुद्धार के क्षेत्र में व्यापक और महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं। उनका संबंध एक धार्मिक और विद्वान परिवार से था। उनके पूर्वजों में ख़्वाजा क़ुत्बुद्दीन मौदूद चिश्ती शामिल थे, जो ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के प्रमुख शिष्य थे। इसी कारण उनका परिवार “मौदूदी” कहलाया।
मौलाना मौदूदी की प्रारंभिक शिक्षा और प्रशिक्षण घर पर उनके पिता की देखरेख में हुआ। शुरुआती ग्यारह वर्षों तक उन्होंने घर के वातावरण में ही धार्मिक और आधुनिक विषयों का अध्ययन किया। बाद में उन्हें औरंगाबाद के मदरसा फ़ुरक़ानिया में सीधे आठवीं कक्षा में दाख़िला मिला। सन् 1914 में उन्होंने मौलवी की परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। इसी दौरान उनका परिवार हैदराबाद चला गया, जहाँ उन्हें दारुल उलूम में आलिम की कक्षा में दाख़िल कराया गया। उस समय दारुल उलूम के प्रमुख हमीदुद्दीन फ़राही थे, लेकिन पिता के निधन के कारण मौलाना वहाँ केवल छह महीने ही औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर सके।
अल्लाह ने मौलाना मौदूदी को असाधारण लेखन क्षमता से नवाज़ा था। इसी कारण उन्होंने क़लम को अपने विचारों की अभिव्यक्ति और आजीविका का माध्यम बनाया और पत्रकारिता से अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने मदीना (बिजनौर), ताज (जबलपुर) और जमीयत उलमा-ए-हिंद के दैनिक पत्र अल-हमियत (दिल्ली) जैसे अख़बारों में संपादक के रूप में सेवाएँ दीं। सन् 1925 में जब जमीयत उलमा-ए-हिंद ने कांग्रेस के साथ सहयोग का निर्णय लिया, तो मौलाना मौदूदी ने सिद्धांतों के आधार पर अल-हमियत के संपादन पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
मौलाना मौदूदी अत्यंत विपुल लेखक थे। उन्होंने क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह, राजनीति, अर्थशास्त्र, सभ्यता, नैतिकता और समकालीन विषयों पर दर्जनों पुस्तकें लिखीं। उनकी विश्वविख्यात कृति तफ़हीम-उल-क़ुरआन (6 खंड) क़ुरआन की व्याख्या की परंपरा में एक विशिष्ट स्थान रखती है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में तफ़हीमात, रसाइल व मसाइल, सीरत-ए-सरवर-ए-आलम ﷺ, पर्दा, अल-जिहाद फ़िल-इस्लाम, ख़िलाफ़त और मुलूक़ियत, सूद, इस्लामी अर्थव्यवस्था, इस्लामी राजनीति, इस्लामी सभ्यता और उसके सिद्धांत, सुन्नत की संवैधानिक हैसियत, तजदीद व इह्या-ए-दीन और क़ुरआन की चार बुनियादी संज्ञाएँ शामिल हैं। उनकी रचनाओं ने न केवल उपमहाद्वीप बल्कि पूरे इस्लामी जगत में वैचारिक बहसों को नई दिशा दी।
मौलाना मौदूदी ने दीन के पुनरुद्धार को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। एक सजग चिंतक के रूप में उन्होंने इतिहास, राजनीति और सभ्यता पर आलोचनात्मक दृष्टि डाली और अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने के लिए जमात-ए-इस्लामी की स्थापना की। उनकी सोच से असहमति हो सकती है, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने जीवन के लगभग हर पहलू पर लिखा और शिक्षा, राजनीति, समाज और धार्मिक विचार पर निरंतर अपने विचार व्यक्त किए।
मौलाना मौदूदी का निधन 22 सितंबर 1979 को अमेरिका के बफ़ेलो, न्यूयॉर्क में हुआ, जहाँ वे इलाज के सिलसिले में गए हुए थे। बाद में उन्हें लाहौर के इचरा स्थित उनके निवास में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।