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"اسرار خودی "شاعر مشرق علامہ اقبال كی مشہورفارسی كتاب ہے ۔یہ اقبال كی پہلی فلسفیانہ شاعری كا مجموعہ ہے۔اس كتاب میں انفرادیت كے بارے میں نظمیں شامل ہیں۔پروفیسر یوسف سلیم ہاشمی نے"اسرار خودی " کی شرح کے ساتھ مرتب کیا ہے۔اسرار خودی دراصل حقائق و معارف كا گنجینہ ہے۔اس میں شامل بہت سے اشعار ایسے ہیں كہ ہر ایك كی تشریح میں كئی كتابیں لكھی جاسكتی ہیں۔لیكن اس كتاب میں شرح كو اختصار سے پیش کیاہے۔علامہ اقبال نے اس مثنوی میں بلاشبہ خودی كے اسرار واضح كیے ہیں۔یعنی وہ استعدادیں یا صلاحیتیں جو خودی میں پوشیدہ ہیں ۔علامہ کو جب معلوم ہواکہ قوم كی بربادی كا سبب نفی خودی كا غیر اسلامی عقیدہ ہے تو انھوں نے اپنے دل و دماغ قوتوں كو اثبات خودی كے اسلامی عقیدہ كی اشاعت كے لیے وقف كردیا۔اسی لیے اسرارخودی میں مسلمانوں میں عشق رسول ﷺ كے تحت خودی کو بیدار کرنے کی کوشش کی ۔اقبال نے اس مثنوی كے ذریعہ مسلمانوں میں قوت ،ایمانی جذبہ اور انقلاب پیدا کردیاتھا۔
पहचान: इक़बाल अध्ययन के विशेषज्ञ, शोधकर्ता, दार्शनिक और इक़बाल के प्रतिष्ठित व्याख्याकार
यूसुफ़ सलीम चिश्ती उर्दू दुनिया के एक प्रमुख शोधकर्ता, दार्शनिक और विशेष रूप से इक़बाल अध्ययन के विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अल्लामा इक़बाल की रचनाओं की व्याख्या और व्याख्यान में असाधारण सेवाएँ दीं तथा सूफ़ीवाद, दर्शन और तुलनात्मक धर्मों पर महत्वपूर्ण विद्वत्तापूर्ण कार्य किया।
यूसुफ़ सलीम चिश्ती का जन्म 2 मई 1895 को बरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिता मुहम्मद ईसा ख़ान पुलिस विभाग में कार्यरत थे, जबकि उनकी माता अज़ीज़ जहाँ बेगम धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने घर पर अरबी, फ़ारसी और उर्दू में प्राप्त की।
1912 में मैट्रिक, 1916 में एफ.ए. और 1918 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में बी.ए. ऑनर्स किया। बाद में दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया और धार्मिक शिक्षा के तहत आलिम-ए-इलाहियात की उपाधि भी प्राप्त की। उन्होंने वेद और धर्मशास्त्र का भी अध्ययन किया, जिससे तुलनात्मक धर्मों के अध्ययन में उनकी दृष्टि व्यापक हुई।
शिक्षा पूरी करने के बाद वे अध्यापन से जुड़े। कानपुर और लाहौर के शिक्षण संस्थानों में लेक्चरर और प्रोफेसर रहे। सियालकोट के मरे कॉलेज में भी पढ़ाया। लाहौर के इशाअत-ए-इस्लाम कॉलेज के प्रिंसिपल बने और 1943 तक इस पद पर रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दिल्ली और फिर विभिन्न रियासतों में शैक्षिक और परामर्श संबंधी दायित्व निभाए।
विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए। कराची और लाहौर में रहे तथा लेखन और शोध को अपना मुख्य कार्य बना लिया। कराची के शैक्षिक संस्थानों से भी जुड़े रहे और उनकी निजी लाइब्रेरी विद्वानों में प्रसिद्ध थी।
उनकी विद्वता का प्रमुख पक्ष तुलनात्मक धर्म और सूफ़ीवाद पर शोध है। उनकी पुस्तकें “तारीख़-ए-तसव्वुफ़” और “इस्लामी तसव्वुफ़ में ग़ैर-इस्लामी विचारों की आमेज़िश” विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
इक़बाल अध्ययन के विशेषज्ञ के रूप में उनका स्थान अत्यंत ऊँचा है। उन्हें लम्बे समय तक अल्लामा इक़बाल की संगति का अवसर मिला। उन्होंने इक़बाल की सभी उर्दू और फ़ारसी कृतियों की विस्तृत व्याख्याएँ लिखीं, जिनमें शामिल हैं: शरह-ए-बांग-ए-दरा, शरह-ए-बाल-ए-जिब्रील, शरह-ए-ज़र्ब-ए-कलीम, शरह-ए-अरमग़ान-ए-हिजाज़, शरह-ए-जाविद-नामा, शरह-ए-ज़बूर-ए-अजम.
इक़बाल के अलावा उन्होंने ग़ालिब और अकबर इलाहाबादी पर भी व्याख्यात्मक और शोध कार्य किया।
उनकी लगभग 25 पुस्तकें विभिन्न विषयों पर प्रकाशित हुईं, जिनमें सूफ़ीवाद, दर्शन, इक़बाल अध्ययन और साहित्यिक व्याख्या प्रमुख हैं। उनके सैकड़ों लेख विभिन्न पत्रिकाओं में बिखरे हुए हैं।
गहन अध्ययन, आलोचनात्मक दृष्टि और ईमानदार विद्वत्तापूर्ण रवैये के कारण उन्हें गंभीर विद्वानों में गिना जाता है। वे स्वयं को इक़बाल का “वकील” कहा करते थे, जो उनकी श्रद्धा और बौद्धिक निष्ठा का प्रतीक था।
निधन: 11 फ़रवरी 1984 को लाहौर में उनका निधन हुआ।