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लेखक: परिचय

पहचान: बच्चों के लेखक, धार्मिक चिंतक, शिक्षाविद, पत्रकार तथा सिंधी और उर्दू साहित्य के लेखक

मौलाना अब्दुल वाहिद सिंधी का जन्म 1912 में सिंध के ज़िला पनुआकिल (पूर्व ज़िला सुक्कुर) के गाँव भले डिनो में हुआ। कम उम्र में ही वे अनाथ हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने का सिलसिला जारी रखा। प्रारंभिक शिक्षा घोटकी के प्रसिद्ध संस्थान “मदरसा क़ासिमुल उलूम” में प्राप्त की, जहाँ उन्हें अंग्रेज़ी भाषा से रुचि पैदा हुई। बाद में मौलाना दीन मुहम्मद वफ़ाई की सहायता से अब्दुल्ला हारून स्कॉलरशिप प्राप्त कर 1922 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में प्रवेश लिया।

जामिया मिल्लिया के शैक्षिक और बौद्धिक वातावरण ने उनकी प्रतिभा को निखारा, जहाँ उन्हें मौलाना मुहम्मद अली जौहर, डॉ. मुहम्मद अली बिजनौरी, ख्वाजा अब्दुल हई और डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे महान शिक्षकों का सान्निध्य मिला। इसी वातावरण में उनके भीतर धार्मिक चेतना, राष्ट्रीय विचार और एक विशिष्ट अभिव्यक्ति शैली विकसित हुई, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

मौलाना अब्दुल वाहिद सिंधी ने बच्चों के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें “इस्लाम कैसे शुरू हुआ” और “इस्लाम के मशहूर सिपहसालार” विशेष रूप से लोकप्रिय हुईं। इसके अतिरिक्त उन्होंने बच्चों के लिए सुधारात्मक कहानियाँ भी लिखीं।

उनकी लेखनी की विशेषता यह है कि वे बच्चों को धर्म की शिक्षा केवल जानकारी के रूप में नहीं देते, बल्कि उनके भीतर चरित्र निर्माण, सेवा, धैर्य, कृतज्ञता, ईमानदारी और भाईचारे की भावना विकसित करते हैं। उन्होंने क़ुरआन और इस्लामी इतिहास को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि बच्चे उसे आसानी से समझ सकें और अपने जीवन में लागू कर सकें।

भारत विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए। प्रारंभ में उनकी रचनाएँ “अब्दुल वाहिद जामई” के नाम से प्रकाशित होती रहीं, लेकिन बाद में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी से प्रभावित होकर उन्होंने “अब्दुल वाहिद सिंधी” नाम अपनाया।

पाकिस्तान बनने के बाद उन्होंने पत्रकारिता और संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाएँ दीं। 15 नवंबर 1948 को सूचना मंत्रालय के अंतर्गत प्रकाशित समाचार बुलेटिन के उर्दू और सिंधी अनुवाद से जुड़े और इसके सहायक संपादक बने। बाद में यही बुलेटिन “नई ज़िंदगी” नामक साहित्यिक पत्रिका में परिवर्तित हुआ, जिसकी संपादना उन्होंने की।

“नई ज़िंदगी” पत्रिका सिंधी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इसने नए लेखकों को प्रोत्साहन दिया और साहित्यिक जड़ता को तोड़ा। उन्होंने महिला लेखिकाओं को भी आगे बढ़ाया, जिनमें सुमैरा ज़रीन, मेहताब महबूब और रशीदा हिजाब के नाम उल्लेखनीय हैं।

उन्होंने “नई ज़िंदगी” के अंतर्गत प्रकाशन श्रृंखला शुरू की और सिंधी साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित कीं, जैसे “मेहरान की लहरें”, “मेहरान की मौजें”, “मेहरान के मोती” और “शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई” आदि।

निधन: मौलाना अब्दुल वाहिद सिंधी का निधन 3 जनवरी 1988 को कराची में हुआ और वहीं दफ़नाए गए।

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