aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
फ़सील-ए लब रशीद क़ैसरानी का पहला मजमूआ-ए कलाम है जो ग़ज़लों पर मुश्तमिल है। इसमें जदीद उर्दू ग़ज़ल की एक मुनफ़रद आवाज़ पेश की गई है, जो ज़िंदगी के हक़ायक़ का इस्बात करती है।