aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
यह किताब यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा मुस्लिम शासकों पर लगाए गए धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता के आरोपों का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें औरंगज़ेब, शाहजहाँ, शेर शाह सूरी और अन्य शख्सियतों के शासनकाल का पुनर्मूल्यांकन किया गया है, उनकी प्रशासनिक नीतियों और गैर-मुसलमानों को दिए गए अधिकारों को उजागर किया गया है। इसका उद्देश्य भारत में इस्लामी शासन के बारे में प्रचलित ऐतिहासिक गलतफहमियों को दूर करना है।
पहचान: प्रसिद्ध चिकित्सक, कहानीकार, उपन्यासकार और बहुआयामी साहित्यकार।
कौसर चाँदपुरी का जन्म 18 अगस्त 1900 को उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर के शहर चाँदपुर में हुआ। उनके पिता हकीम सैयद मुज़फ़्फ़र अली और दादा हकीम सैयद मंसूर अली अपने समय के मशहूर वैद्य थे। उनका परिवार धार्मिक, विद्वतापूर्ण और चिकित्सकीय परंपरा वाला था। प्रारंभिक शिक्षा दीनियात से हुई, फिर फ़ारसी और उर्दू की शिक्षा प्राप्त की।
1914 में वे भोपाल गए और आसफ़िया तिब्बिया कॉलेज में दाख़िला लिया। 1918 में तबीब-ए-कामिल की डिग्री प्राप्त कर चिकित्सा कार्य शुरू किया। 1955 में भोपाल राज्य में अफ़सर-उल-अतिब्बा बने। 1965 में हकीम अब्दुल हमीद के निमंत्रण पर दिल्ली आए और हमदर्द नर्सिंग होम में मेडिकल ऑफ़िसर के रूप में सेवा दी। अपनी ईमानदारी और लगन से वे मरीज़ों में बहुत लोकप्रिय रहे।
विद्यार्थी जीवन में उन्हें शायरी का शौक हुआ। उन्होंने मुहम्मद ज़करिया माइल से अरूज़ सीखी और जमी़ल अहमद सहसवानी, मानी जाईसी, असर लखनवी, अज़ीज़ लखनवी, हादी मछली शहरी और सीमाब अकबराबादी से इस्लाह ली। परंतु वे केवल शायरी तक सीमित नहीं रहे और गद्य लेखन की ओर मुड़े। 1917 से उन्होंने निबंध लिखने शुरू किए जो निगार, नैरंग-ए-ख़याल, अदबी दुनिया और शाहकार जैसे पत्रों में प्रकाशित हुए।
बाद में उन्होंने कहानी लेखन शुरू किया। उनकी पहली कहानी “फ़ज़ा-ए-बरशिगाल का एक तीर” 1924 में पत्रिका अल-कमाल (लाहौर) में प्रकाशित हुई। 1926 में उनका पहला संग्रह “दिल गुदाज़ अफ़साने” प्रकाशित हुआ जिसे बहुत सराहा गया और भोपाल का पहला कहानी-संग्रह माना गया। इसके बाद उनके तेरह और संग्रह आए। लगभग 23 वर्षों तक वे ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े रहे और 75 से अधिक कहानियाँ प्रसारित हुईं।
उन्होंने उपन्यास लेखन में भी नाम कमाया और उर्दू साहित्य को 17 उपन्यास दिए। बच्चों के लिए 25 से अधिक पुस्तकें लिखीं जो अत्यंत लोकप्रिय रहीं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक समस्याएँ, मानवीय भावनाएँ और सुधारवादी दृष्टि मिलती है। भाषा सरल, प्रभावशाली और मुहावरेदार है। चिकित्सा ज्ञान के कारण कुछ कहानियों में चिकित्सकीय संकेत भी मिलते हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में दिलगुदाज़ अफ़साने, दुनिया की हूर, माह-ओ-अंजुम, दिलचस्प अफ़साने, गुल-ओ-लाला, शबनमचे, अश्क-ओ-शरर, शोला-ए-संग, रात का सूरज, आवाज़ों की सलीब, अतिब्बा-ए-अहद-ए-मुग़लिया, मोहब्बत और सल्तनत, शाम-ए-ग़ज़ल, पत्थर का गुलाब, मुरझाई कलियाँ, राख और कलियाँ, दीदा-ए-बीना और कारवाँ हमारा शामिल हैं। उन्होंने इतिहास, जीवनी, व्यंग्य, आलोचना, शोध और रिपोर्ताज भी लिखे। उनकी रचनाएँ उपमहाद्वीप की लगभग सभी प्रमुख उर्दू पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
मृत्यु: 13 अक्टूबर 1988 को 88 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।