Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

लेखक: परिचय

पहचान: प्रसिद्ध शोधकर्ता, उर्दू भाषा के इतिहासकार, भाषाविद, संपादक, आलोचक और उर्दू की प्राचीन साहित्यिक परंपरा के गंभीर अध्येता

डॉ. मोहम्मद अंसारुल्लाह का जन्म 4 जनवरी 1936 को आज़मगढ़ में हुआ। उर्दू भाषा और साहित्य, विशेष रूप से प्राचीन ग्रंथों, भाषाविज्ञान और भाषा के इतिहास के क्षेत्र में उनकी सेवाएं अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उनका पहला शोध लेख 1955 में नियाज़ फ़तहपुरी की प्रसिद्ध पत्रिका 'निगार' में प्रकाशित हुआ। शोध के उसूल और तरीके उन्होंने क़ाज़ी अब्दुल वदूद से सीखे, जिसका प्रभाव उनके पूरे अकादमिक जीवन में दिखाई देता है। उन्होंने लगभग चार सौ शोध लेख और डेढ़ दर्जन से अधिक शोधपरक पुस्तकें लिखीं और संपादित कीं। 1967 से 1996 तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में लेक्चरर, रीडर और प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने शोध, संपादन, इतिहास, आलोचना, भाषाविज्ञान, अनुवाद और शब्दकोश निर्माण को अपनी अकादमिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा।

मोहम्मद अंसारुल्लाह की पहली महत्वपूर्ण पुस्तक 'उर्दू के हुरूफ़-ए-तहज्जी' 1972 में प्रकाशित हुई, जिसमें उर्दू लिपि, अक्षरों की बनावट, नई ध्वनियों के लिए नए अक्षरों की रचना और इमला के मसलों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसी वर्ष उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक 'पद्मावत की मुख्तसर फ़रहंग' प्रकाशित हुई, जिसमें मलिक मोहम्मद जायसी की 'पद्मावत' की शब्दावली तैयार की गई। इसकी भूमिका में उन्होंने जायसी, अवधी भाषा और उस दौर की भाषाई स्थिति पर विस्तार से विचार किया।

अंसारुल्लाह ने 'क़ायदा-ए-हिंदी-ए-रेख़्ता', 'तल्ख़ीस-ए-मुअल्ला', 'रसाला ज़बान-ए-रेख़्ता', 'क़ितआ मुंतख़बा', 'बरहन की कहानी' और मुल्ला दाऊद की 'चंदायन' जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन भी किया। इन पुस्तकों पर उनके मुकद्दमे और टिप्पणियां उनके व्यापक अध्ययन, शोध-दृष्टि और प्राचीन साहित्य से गहरी पहचान का प्रमाण हैं। विशेष रूप से 'चंदायन' के संपादन में उन्होंने पाठ-संशोधन, अतिरिक्त अंशों की पहचान, अनुवाद और व्याख्यात्मक टिप्पणियों के माध्यम से महत्वपूर्ण अकादमिक कार्य किया।

इसके अतिरिक्त 'जामेअ-उत-तज़किरा' (तीन भागों में), 'ग़ालिब बिब्लियोग्राफी', 'संस्कृत-उर्दू शब्दकोश', 'तारीख़-ए-अक़लीम-ए-अदब', 'तारीख़ ज़बान व अदब-ए-उर्दू', 'उर्दू में तदवीन', 'उर्दू सर्फ', 'उर्दू नह्व' और 'उर्दू पर तमिल के असरात' जैसी पुस्तकें भी उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हैं।

डॉ. मोहम्मद अंसारुल्लाह ने उर्दू भाषा की उत्पत्ति और विकास के संबंध में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार अवधी को उर्दू भाषा का मूल स्रोत माना जाना चाहिए। उन्होंने दिल्ली को उर्दू का एकमात्र जन्मस्थान मानने के बजाय भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास तथा विभिन्न बोलियों के प्रभाव को आधार बनाकर अपने विचार विकसित किए। यद्यपि उनके कुछ विचारों से सभी विद्वान सहमत नहीं हुए और उन पर आलोचना भी हुई, फिर भी यह स्वीकार किया जाता है कि उन्होंने उर्दू भाषाविज्ञान के कई महत्वपूर्ण विषयों को नए दृष्टिकोण से देखने की राह खोली और आगे के शोध के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराई।

उनकी अकादमिक सेवाओं के सम्मान में ऑल इंडिया मीर अकादमी, लखनऊ ने उन्हें 'इम्तियाज़-ए-मीर' से सम्मानित किया, जबकि पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी, कोलकाता ने उनकी पुस्तक 'मुतमदुद्दौला आगा मीर' पर प्रथम पुरस्कार प्रदान किया।

निधन: डॉ. मोहम्मद अंसारुल्लाह का निधन 2017 में हुआ।

.....और पढ़िए
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

लेखक की अन्य पुस्तकें

लेखक की अन्य पुस्तकें यहाँ पढ़ें।

पूरा देखिए

लोकप्रिय और ट्रेंडिंग

सबसे लोकप्रिय और ट्रेंडिंग उर्दू पुस्तकों का पता लगाएँ।

पूरा देखिए
बोलिए