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पहचान: प्रसिद्ध शोधकर्ता, ग़ालिब अध्ययन के विशेषज्ञ, फ़ारसी के विद्वान, भाषाविद् और शास्त्रीय ग्रंथों के प्रामाणिक व्याख्याकार
प्रोफेसर नज़ीर अहमद का जन्म 3 जनवरी 1915 को उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के एक गाँव में हुआ। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की और 1940 में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य में एम.ए. किया। बाद में 1945 में उन्होंने प्रसिद्ध फ़ारसी कवि ज़ुहूरी के जीवन और साहित्यिक योगदान पर शोधप्रबंध लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। यह शोध उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान मसऊद हसन रिज़वी अदीब के निर्देशन में पूरा किया। 1950 में “अहद-ए-आदिलशाही के फ़ारसीगो शुअरा” विषय पर डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की, जबकि 1956 में इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय की प्रसिद्ध कृति “नौरस” के संपादन और शोध पर उर्दू में भी डी.लिट. से सम्मानित किए गए।
1955 में भारत सरकार के छात्रवृत्ति कार्यक्रम के अंतर्गत वे ईरान गए, जहाँ उन्होंने तेहरान विश्वविद्यालय से पहलवी और आधुनिक फ़ारसी भाषा में डिप्लोमा प्राप्त किया तथा ईरान के प्रमुख विद्वानों से ज्ञान अर्जित किया। भारत लौटने के बाद वे लखनऊ विश्वविद्यालय के फ़ारसी विभाग से जुड़े। 1957 में रशीद अहमद सिद्दीक़ी के निमंत्रण पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आए, जहाँ भारत सरकार की एक अकादमिक परियोजना के अंतर्गत उर्दू भाषा और साहित्य के इतिहास से संबंधित कार्य किया। बाद में वे फ़ारसी विभाग में रीडर और फिर प्रोफेसर नियुक्त हुए। वे सत्रह वर्षों तक फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष रहे तथा कला संकाय के डीन के रूप में भी सेवाएँ दीं।
प्रोफेसर नज़ीर अहमद को फ़ारसी और उर्दू अनुसंधान में असाधारण स्थान प्राप्त था। उन्होंने एक हज़ार से अधिक शोध-लेख लिखे, जो भारत, पाकिस्तान, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, अमेरिका और अन्य देशों की प्रतिष्ठित अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनके शोध का क्षेत्र फ़ारसी और उर्दू साहित्य, भाषाविज्ञान, इतिहास, संस्कृति, संगीत, सुलेख और ग़ालिब अध्ययन तक फैला हुआ था। उनके प्रमुख शोध-संग्रहों में तहक़ीकी मक़ालात, तारीखी व अदबी मुतालए, ग़ालिब आशुफ़्ता, ग़ालिब पर चंद मक़ालात और ग़ालिब पर चंद तहक़ीकी मुतालए विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ग़ालिब अध्ययन और दकनी साहित्य के क्षेत्र में भी उनकी सेवाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय की प्रसिद्ध कृति नौरस को अनेक पांडुलिपियों के आधार पर संपादित और प्रकाशित किया, जिसे दकनी उर्दू का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। इसी प्रकार दीवान-ए-महंदर, मकातिब-ए-सनाई, दीवान-ए-हमीद लोइकी और नक़्द-ए-क़ातिअ-ए-बुरहान जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन और शोध भी उनके उल्लेखनीय कार्यों में शामिल है। प्राचीन फ़ारसी शब्दकोशों पर उनका कार्य बुनियादी महत्व रखता है। उन्होंने फ़रहंग-ए-क़व्वास, दस्तूरुल-अफ़ाज़िल, फ़रहंग-ए-जहाँ पोया और लिसान-उश-शुअरा जैसे दुर्लभ ग्रंथों को शोध सहित प्रकाशित किया।
प्रोफेसर नज़ीर अहमद एक उच्चकोटि के संपादक भी थे। वे प्रसिद्ध शोध-पत्रिका फ़िक्र-ओ-नज़र के सहायक संपादक रहे और उनकी मेहनत से यह पत्रिका उर्दू जगत की प्रतिष्ठित अकादमिक पत्रिकाओं में शामिल हो गई। इसके अतिरिक्त वे ग़ालिब और मआरिफ़ जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं की संपादकीय सेवाओं से भी जुड़े रहे। वे ग़ालिब इंस्टीट्यूट के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और आजीवन उसके ट्रस्टी रहे।
उन्होंने पाकिस्तान, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, सऊदी अरब, कुवैत, इराक़, रूस, इंग्लैंड और अमेरिका की अनेक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों और सम्मेलनों में भाग लेकर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। उनकी अकादमिक सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने 1987 में उन्हें “पद्मश्री” से सम्मानित किया। 1976 में उन्हें “ग़ालिब पुरस्कार” मिला, जबकि तेहरान विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद प्रोफेसरशिप प्रदान की। 2005 में उन्हें ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के सर्वोच्च सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
प्रोफेसर नज़ीर अहमद अपनी गहन शोध-दृष्टि, असाधारण स्मरण शक्ति, अकादमिक ईमानदारी और सूक्ष्म अध्ययन के लिए प्रसिद्ध थे। वे जिस विषय पर लिखते, उसे अत्यंत प्रामाणिकता और गहराई के साथ पूर्ण करते थे। उर्दू और फ़ारसी अनुसंधान में उनका स्थान एक विश्वसनीय और अविस्मरणीय प्रामाणिक विद्वान का है।
निधन: प्रोफेसर नज़ीर अहमद का निधन 19 अक्टूबर 2008 को अलीगढ़ में हुआ।