aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पहचान: प्रतिष्ठित पत्रकार, उपन्यासकार, अफ़सानानिगार, अनुवादक और अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू के पूर्व महासचिव
क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार का जन्म दिसंबर 1889 में Moradabad के मोहल्ला तंबाकू वालान में हुआ। वे एक विद्वत एवं धार्मिक परिवार से संबंध रखते थे; उनके दादा ग़ाज़ी हामिद अली मुरादाबाद के सदर क़ाज़ी थे और पिता क़ाज़ी अबरार अहमद अपने समय के सम्मानित व्यक्तियों में गिने जाते थे। प्रारंभिक शिक्षा मुरादाबाद में प्राप्त की और 1905 में हाई स्कूल उत्तीर्ण किया, तत्पश्चात Aligarh Muslim University (तत्कालीन अलीगढ़ शिक्षण संस्थान) से इंटरमीडिएट किया।
पिता की इच्छा पर उन्होंने सरकारी सेवा ग्रहण की और तहसीलदार नियुक्त हुए, किंतु यह नौकरी उनके स्वभाव के अनुकूल न थी। अतः उन्होंने शीघ्र ही इस्तीफ़ा दे दिया और मुरादाबाद लौटकर पत्रकारिता को अपना क्षेत्र बनाया। पत्रकारिता की शिक्षा उन्हें प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता एवं पत्रकार Mohammad Ali Jauhar के संरक्षण में मिली, जो अपने समाचारपत्र हमदर्द के माध्यम से उर्दू पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे थे।
1921 में वे ख़िलाफ़त कमेटी के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में लंदन गए। कुछ समय उन्होंने मुरादाबाद में बर्तनों का व्यापार भी किया, यद्यपि यह सफल न हुआ। 1928 से 1930 तक वे मुरादाबाद नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष रहे। 1934 में वे Hyderabad चले गए, जहाँ सूचना विभाग से जुड़े रहे; बाद में लखनऊ और फिर दिल्ली गए।
भारत विभाजन के बाद 1947 में वे Anjuman Taraqqi-e-Urdu के महासचिव नियुक्त हुए। यह दायित्व उन्हें Abul Kalam Azad की प्रेरणा से मिला। उन्होंने संस्था के बिखरे ढाँचे को पुनर्गठित किया, देशभर में उसकी शाखाओं को सक्रिय बनाया और नई शाखाएँ स्थापित कीं।
क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार एक बहुआयामी साहित्यकार थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं:
लैला के ख़ुतूत — एक तवायफ़ की भावनाओं और स्त्री-शोषण का मार्मिक चित्रण
मजनूँ की डायरी — युवाओं के मानसिक और नैतिक सुधार पर आधारित कृति
तीन पैसे की छोकरी — अफ़सानों का संग्रह
पिंदार का सनमकदा — जाति-पांति और सामाजिक असमानता के विरुद्ध नाटक
नक़्श-ए-फ़रंग — यूरोप का व्यंग्यात्मक एवं सूचनात्मक यात्रा-वृत्तांत
आसार-ए-जमालुद्दीन अफ़ग़ानी
आसार-ए-अबुल कलाम आज़ाद
हयात-ए-अजमल
The Prophet का उर्दू अनुवाद “उस ने कहा”
John Galsworthy के उपन्यास का अनुवाद “सेब का दरख़्त”
उनकी गद्य-शैली में रूमानीपन, मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ, सामाजिक चेतना और व्यंग्य की धार स्पष्ट दिखाई देती है। स्त्री-शोषण, वर्गभेद, धार्मिक पाखंड और सामाजिक ढोंग जैसे विषय उनकी रचनाओं में विशेष महत्व रखते हैं।
निधन: 17 जनवरी 1956 को अलीगढ़ में उनका निधन हुआ।