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पहचान: इमाम-ए-फ़न, ख़ातिम-उश-शुअरा, आलिम-ए-दीन, प्रसिद्ध सूफ़ी कवि, इतिहासकार और "नूरुद्दीन" तथा "अश-शैख़ अर-रईस" जैसे उपाधियों से प्रसिद्ध एक बहुआयामी व्यक्तित्व
अब्दुर्रहमान जामी का जन्म 23 शाबान 817 हिजरी (7 नवम्बर 1414 ई.) को ख़ुरासान के क्षेत्र जाम के कस्बे खरजर्द में हुआ, जो वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान में स्थित है। उनके पिता अहमद बिन मुहम्मद दश्ती एक प्रतिष्ठित विद्वान थे, जिन्होंने उनकी प्रारंभिक शिक्षा और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल्यावस्था में ही वे हेरात चले गए, जो उस समय ज्ञान और कला का एक प्रमुख केंद्र था। यही वातावरण उनके बौद्धिक विकास का आधार बना।
अब्दुर्रहमान जामी अपने युग के प्रमुख इस्लामी विद्वानों और सूफ़ियों में गिने जाते हैं। उनकी शिक्षा हेरात और समरकंद के प्रसिद्ध शिक्षण केंद्रों में हुई, जहाँ उन्होंने अरबी, तर्कशास्त्र, खगोलशास्त्र और फ़िक़्ह में अद्वितीय दक्षता प्राप्त की। उनकी प्रतिभा का यह आलम था कि क़ाज़ी ज़ादा रूमी जैसे महान विद्वान ने स्वीकार किया कि "समरकंद की स्थापना के बाद से अब तक इस युवक के स्तर का कोई व्यक्ति अमू दरिया पार कर यहाँ नहीं आया।" वे अध्ययन के दौरान ही प्राचीन ग्रंथों और उनकी व्याख्याओं का संशोधन कर देते थे।
सूफ़ी मार्ग में उनका संबंध सादुद्दीन मुहम्मद काशग़री के सिलसिले से था, जहाँ उन्होंने उच्च आध्यात्मिक स्थान प्राप्त किया। वे स्वभाव से साधक, सरल और एकांतप्रिय थे, किंतु सुल्तान हुसैन मिर्ज़ा और सुल्तान मुहम्मद फ़ातिह जैसे महान शासक भी उनका अत्यंत सम्मान करते थे।
जामी की साहित्यिक और विद्वतापूर्ण सेवाएँ अत्यंत व्यापक हैं। उनकी कुल 49 रचनाएँ (कविता और गद्य दोनों में) मानी जाती हैं। उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना "हफ्त औरंग" (जिसमें यूसुफ-ज़ुलेखा, लैला-मजनूँ और सिलसिलत-उज़-ज़हब शामिल हैं) फ़ारसी साहित्य की एक महान कृति है। गद्य में उन्होंने सूफ़ीवाद, आध्यात्मिकता और इतिहास पर लगभग 11 महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं।
उनकी कविताओं में प्रेम-ए-रसूल और ईश्वरीय ज्ञान का गहरा प्रभाव मिलता है, जिसके कारण उन्हें "ख़ातिम-उश-शुअरा" (क्लासिकी फ़ारसी कवियों के अंतिम महान कवि) कहा जाता है। उन्होंने 1472 ई. में हज की यात्रा की और विभिन्न इस्लामी देशों की यात्रा के बाद हेरात को अपना स्थायी निवास बनाया। उनका पूरा जीवन इस्लाम के प्रचार और ज्ञान-साहित्य की सेवा में व्यतीत हुआ।
निधन: 18 मुहर्रम 898 हिजरी (1492 ई.) को हेरात (अफ़ग़ानिस्तान) में उनका निधन हुआ और वहीं दफ़न हुए।