पुस्तकालय: परिचय
इलाहाबाद विश्वविद्यालय केंद्रीय पुस्तकालय भारत के प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक विश्वविद्यालय पुस्तकालयों में से एक है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना 23 सितंबर 1887 को हुई थी और यह कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास विश्वविद्यालयों के बाद भारत का चौथा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है। इस पुस्तकालय की शुरुआत म्योर सेंट्रल कॉलेज (1872) के पुस्तकालय से हुई, जिसे बाद में विश्वविद्यालय में सम्मिलित कर लिया गया। वर्तमान पुस्तकालय भवन की आधारशिला 17 जनवरी 1910 को सर जॉन हेवेट ने रखी, जबकि विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय ने 1916 में औपचारिक रूप से अपनी सेवाएँ प्रारम्भ कीं। 1946–47 में भारत में पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने इसके विकास के लिए एक व्यापक योजना तैयार की, जिसकी अनुशंसाओं के आधार पर 1973 में वर्तमान विशाल एवं आधुनिक पुस्तकालय भवन का निर्माण किया गया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय का केंद्रीय पुस्तकालय शिक्षण, अनुसंधान और शैक्षणिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र है, जो विद्यार्थियों, अध्यापकों और शोधकर्ताओं की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करता है। विभिन्न विषयों के समृद्ध संग्रह के साथ-साथ यहाँ उर्दू, फ़ारसी और अरबी की लगभग 30,000 दुर्लभ एवं मूल्यवान पुस्तकें सुरक्षित हैं। पुस्तकालय का समग्र संग्रह लाखों पुस्तकों, शोध संदर्भों, पत्रिकाओं तथा अन्य शैक्षणिक सामग्री पर आधारित है। एक शताब्दी से अधिक समय से यह पुस्तकालय भारतीय उपमहाद्वीप की बौद्धिक एवं साहित्यिक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा आज भी अध्ययन और शोध का एक प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता है।
इस अमूल्य विद्वत् धरोहर के संरक्षण और इसे वैश्विक स्तर पर पाठकों तक पहुँचाने के उद्देश्य से रेख़्ता ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय केंद्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित दुर्लभ उर्दू पुस्तकों के एक बड़े हिस्से का डिजिटलीकरण किया है। परिणामस्वरूप ये दुर्लभ पुस्तकें अब रेख़्ता डिजिटल लाइब्रेरी पर उपलब्ध हैं, जहाँ विश्वभर के पाठक, विद्यार्थी और शोधकर्ता इस बहुमूल्य संग्रह का लाभ उठा सकते हैं।