ग़ुलाम अशरफ़ क़ादरी का परिचय
परिचय: शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक, अध्यापक, कवि और नाटककार
प्रोफेसर गुलाम अशरफ क़ादरी का जन्म 19 जनवरी 1971 को बिहार के ज़िला वैशाली के प्रसिद्ध गाँव अबाबकरपुर में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ का रुख किया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के फ़ारसी विभाग से प्रोफेसर सैयद मोहम्मद तारिक हसन के निर्देशन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनका नियमित शैक्षिक जीवन 2003 में प्रारम्भ हुआ, जब वे गांधी फ़ैज़-ए-आम कॉलेज, शाहजहाँपुर के फ़ारसी विभाग में व्याख्याता नियुक्त हुए। अपनी शैक्षणिक सेवाओं के फलस्वरूप 2021 में वे प्रोफेसर के पद पर आसीन हुए।
प्रोफेसर गुलाम अशरफ क़ादरी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वे कविता में “ख़याल” तख़ल्लुस से लिखते हैं, जबकि टेलीविज़न की दुनिया में ख़याल क़ादरी के नाम से सक्रिय रहे। स्क्रिप्ट राइटिंग से लेकर एडिटिंग तक के विभिन्न चरणों का उन्होंने व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। कुछ समय दिल्ली और मुंबई के मीडिया जगत से जुड़े रहने के बाद वे पुनः शिक्षा और अध्यापन से स्थायी रूप से जुड़ गए। फ़ारसी, उर्दू, अरबी और हिंदी भाषाओं पर उनकी सशक्त पकड़ है।
उनकी प्रमुख कृतियों में “सुख़नवरान-ए-अह्द-ए-पहलवी” (आधुनिक ईरानी कवियों के जीवन और कृतित्व पर आधारित), “आख़िरी फ़रियाद” (हज़रत दिल शाहजहाँपुरी के अप्रकाशित काव्य का संपादन), “ख़मख़ाना-ए-हाफ़िज़” (सूफ़ी अहमद हुसैन अहमद शाहजहाँपुरी की फ़ारसी कविता का संकलन) तथा “बूंद-बूंद दरिया” (सेमिनार और कॉन्फ़्रेंस में प्रस्तुत अप्रकाशित शोध-पत्रों का संग्रह) विशेष उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने डॉ. मोहम्मद अब्दुल क़ादिर अहक़र अज़ीज़ी के आलोचनात्मक निबंधों को “ढूँढोगे अगर…” शीर्षक से संपादित किया और फ़ारसी में लिखी गई ईरान की इतिहास-ग्रंथ का हिंदी अनुवाद “किताब ईरान” के नाम से प्रस्तुत किया।
शोधपरक कार्यों में “फ़हरिस्त नुस्ख़ा-हाए-ख़त्ती” विशेष महत्व रखती है, जिसमें गांधी फ़ैज़-ए-आम कॉलेज के केंद्रीय पुस्तकालय में संरक्षित फ़ारसी, अरबी और उर्दू पांडुलिपियों का विवरण दिया गया है। उन्होंने नसीम शाहजहाँपुरी पर आधारित संकलन “मिस्ल-ए-चराग़ था वो…” भी संपादित किया। इसके अतिरिक्त हिंद और ईरान की फ़ारसी कविता का चयन “ख़यालिस्तान” तथा फ़ारसी गद्य का चयन “निगारिस्तान” शीर्षकों से प्रकाशित किया।
नाट्य लेखन के क्षेत्र में भी प्रोफेसर क़ादरी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके चर्चित नाटकों में “अमरबेल”, “तीस पत्ते” और “कश्कोल” शामिल हैं, जबकि उनके नाटकों का संग्रह “अमर बेल” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। इस प्रकार वे शोध, शिक्षण, सृजन और नाट्य लेखन—सभी क्षेत्रों में सक्रिय और प्रभावशाली उपस्थिति रखते हैं।