बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

मिर्ज़ा ग़ालिब

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

मिर्ज़ा ग़ालिब

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    बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

    आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

    गिर्या चाहे है ख़राबी मिरे काशाने की

    दर दीवार से टपके है बयाबाँ होना

    वा-ए-दीवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को

    आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना

    जल्वा अज़-बस-कि तक़ाज़ा-ए-निगह करता है

    जौहर-ए-आइना भी चाहे है मिज़्गाँ होना

    इशरत-ए-क़त्ल-गह-ए-अहल-ए-तमन्ना मत पूछ

    ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उर्यां होना

    ले गए ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-नशात

    तू हो और आप ब-सद-रंग-ए-गुलिस्ताँ होना

    इशरत-ए-पारा-ए-दिल ज़ख़्म-ए-तमन्ना खाना

    लज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक-दाँ होना

    की मिरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा

    हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशेमाँ होना

    हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'

    जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना

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    अज्ञात

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    शुमोना राय बिस्वास

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    शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

    बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

    स्रोत :
    • पुस्तक : Deewan-e-Ghalib Jadeed (Al-Maroof Ba Nuskha-e-Hameedia) (पृष्ठ 166)

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