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अब्बास दाना

1942 | वड़ोदरा, भारत

ग़ज़ल 16

शेर 10

उस से पूछो अज़ाब रस्तों का

जिस का साथी सफ़र में बिछड़ा है

अपने ही ख़ून से इस तरह अदावत मत कर

ज़िंदा रहना है तो साँसों से बग़ावत मत कर

तुम्हारा नाम लिया था कभी मोहब्बत से

मिठास उस की अभी तक मिरी ज़बान में है

तअ'ज्जुब कुछ नहीं 'दाना' जो बाज़ार-ए-सियासत में

क़लम बिक जाएँ तो सच बात लिखना छोड़ देते हैं

जो हैं मज़लूम उन को तो तड़पता छोड़ देते हैं

ये कैसा शहर है ज़ालिम को ज़िंदा छोड़ देते हैं

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