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अब्दुल रहमान बज़्मी

1930 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 2

 

शेर 3

अबस ढूँडा किए हम ना-ख़ुदाओं को सफ़ीनों में

वो थे आसूदा-ए-साहिल मिले साहिल-नशीनों में

छलक जाती है अश्क-ए-गर्म बन कर मेरी आँखों से

ठहरती ही नहीं सहबा-ए-दर्द इन आबगीनों में

था किसी गुम-कर्दा-ए-मंज़िल का नक़्श-ए-बे-सबात

जिस को मीर-ए-कारवाँ का नक़्श-ए-पा समझा था में

 

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